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मैं बदले में यहोवा को क्या दे सकती हूँ?

मैं बदले में यहोवा को क्या दे सकती हूँ?

मैं बदले में यहोवा को क्या दे सकती हूँ?

रूत डाने की ज़ुबानी

मेरी माँ अकसर मज़ाक में कहती थी कि सन्‌ 1933 महाविपत्तियों का साल था। उस साल हिटलर सत्ता में आया, पोप ने उस साल को पवित्र वर्ष घोषित किया और उसी साल मैं पैदा हुई।

मेरे मम्मी-पापा यूट्‌स नगर में रहते थे। यह नगर फ्रांस के लॉरेन इलाके में आता है जो जर्मनी की सरहद के पास है। मम्मी एक कट्टर कैथोलिक थी और पापा एक प्रोटेस्टेंट। सन्‌ 1921 में दोनों ने शादी की। सन्‌ 1922 में मेरी बड़ी बहन हेलन पैदा हुई और कुछ ही समय बाद मम्मी-पापा ने उसे कैथोलिक चर्च में बपतिस्मा दिलवाया।

सन्‌ 1925 में एक दिन, पापा को जर्मन भाषा में द हार्प ऑफ गॉड किताब मिली। किताब पढ़कर उन्हें यकीन हो गया कि उन्हें सच्चाई मिल गयी है। उन्होंने किताब के प्रकाशकों को लिखा और इस तरह पापा की जान-पहचान बिबलफोरशर से हुई। उन दिनों जर्मनी में यहोवा के साक्षी इसी नाम से जाने जाते थे। पापा फौरन सीखी बातें दूसरों को बताने लगे। मम्मी को यह बिलकुल पसंद नहीं था। उन्होंने पापा को प्यार से समझाने की कोशिश की: “आपके जो जी में आए, कीजिए। मैं कुछ नहीं कहूँगी। मगर इन बिबलफोरशर के साथ मिलना-जुलना छोड़ दीजिए।” लेकिन पापा ने तय कर लिया था कि वे एक साक्षी बनेंगे और सन्‌ 1927 में उन्होंने बपतिस्मा ले लिया।

नतीजा यह हुआ कि मेरी नानी, मम्मी पर दबाव डालने लगी कि वह पापा को तलाक दे दे। एक दिन चर्च में पादरी ने लोगों को पापा के बारे में खबरदार करते हुए कहा: “उस झूठे भविष्यवक्‍ता डाने से दूर रहो।” उस दिन चर्च से लौटने के बाद नानी ने हमारे घर की ऊपरी मंज़िल से पापा पर एक गमला फेंका। पापा का सिर तो बच गया लेकिन उनके कंधे पर काफी चोट आयी। इस घटना ने मम्मी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि “जिस धर्म की वजह से लोग दूसरों की जान लेने पर उतारू हो जाएँ, वह धर्म अच्छा कैसे हो सकता है?” इसके बाद से मम्मी ने यहोवा के साक्षियों का साहित्य पढ़ना शुरू कर दिया। जल्द ही उसे यकीन हो गया कि यही सच्चाई है और 1929 में उसने बपतिस्मा ले लिया।

मम्मी-पापा ने हमें यह सिखाने की भरसक कोशिश की कि यहोवा का वजूद सच्चा है। वे हमें बाइबल की कहानियाँ पढ़कर सुनाते थे और फिर हमसे पूछते थे कि बाइबल के किरदारों ने जो किया, वह क्यों किया। उस दौरान पापा ने शाम और रात की शिफ्ट में काम करने से इनकार कर दिया। वे जानते थे कि उनके इस फैसले से उन्हें कम पैसे मिलेंगे और घर का खर्चा चलाना मुश्‍किल हो जाएगा। लेकिन पापा को इसका कोई दुख नहीं था क्योंकि वे मसीही सभाओं, प्रचार और हम बच्चों के साथ अध्ययन करने में ज़्यादा-से-ज़्यादा समय बिताना चाहते थे।

मुसीबतों के काले बादल घिरने लगे

मम्मी-पापा अकसर सफरी अध्यक्षों, साथ ही स्विट्‌ज़रलैंड और फ्रांस बेथेल के भाई-बहनों को घर बुलाते थे। वे लोग हमें बताते थे कि हमारे पड़ोसी देश जर्मनी में हमारे भाई किन-किन मुश्‍किलों से गुज़र रहे हैं। नात्ज़ी सरकार यहोवा के साक्षियों को पकड़-पकड़कर यातना शिविरों में डाल रही थी और बच्चों को उनके माँ-बाप से अलग कर रही थी।

मम्मी-पापा ने मुझे और दीदी को आनेवाली मुश्‍किलों के तूफान से लड़ने के लिए तैयार किया। उन्होंने हमें बाइबल की कई आयतें याद करवायीं, जो मुश्‍किलों में हमारी मदद करतीं। वे हमें ऐसे सिखाते थे: “अगर कभी तुम्हें यह न सूझे कि क्या करना है तो नीतिवचन 3:5, 6 पर मनन करना। अगर तुम्हें स्कूल में आनेवाली आज़माइशों से डर लगे तो 1 कुरिंथियों 10:13 में लिखी बात याद करना। अगर तुम्हें हमसे अलग कर दिया जाए तो नीतिवचन 18:10 के शब्द दोहराना।” मैंने भजन 23 और 91 मुँह-ज़बानी याद कर लिया था और मुझे यहोवा पर पूरा भरोसा था कि वह हमेशा मेरी हिफाज़त करेगा।

सन्‌ 1940 में एलसेस-लॉरेन के इलाके पर नात्ज़ी जर्मनी ने कब्ज़ा कर लिया और नयी सरकार ने ऐलान किया कि बच्चों को छोड़ बाकी सबको नात्ज़ी पार्टी का सदस्य बनना पड़ेगा। पापा ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया, इस पर गेस्टापो (नात्ज़ी सरकार की खुफिया पुलिस) ने उन्हें गिरफ्तार करने की धमकी दी। जब मम्मी ने फौजी वर्दी बनाने से इनकार किया, तो गेस्टापो उसे भी धमकाने लगे।

स्कूल के नाम से ही मुझे दहशत होने लगी थी। हर दिन क्लास शुरू होने से पहले हिटलर के लिए प्रार्थना की जाती थी, फिर सभी बच्चों से कहा जाता कि वे अपना दायाँ हाथ बढ़ाकर “हेल हिटलर” कहकर उसे सलामी दें और राष्ट्र-गान गाएँ। मम्मी-पापा ने यह नहीं कहा कि मुझे हिटलर को सलामी देनी चाहिए या नहीं। इसके बजाय उन्होंने मुझे अपने विवेक को तालीम देने में मदद दी। इसलिए मैंने खुद यह फैसला लिया कि मैं हिटलर को सलामी नहीं दूँगी। मेरे टीचरों ने मुझे चाँटे मारे और मुझे स्कूल से निकाल देने की धमकी दी। एक दिन मुझे स्कूल के पूरे 12 टीचरों के सामने खड़ा कर दिया गया। और हिटलर को सलामी देने के लिए वे मुझसे ज़बरदस्ती करने लगे। तब मैं सात साल की थी। हालाँकि उन्होंने बहुत दबाव डाला लेकिन यहोवा की मदद से मैं अपने फैसले पर अटल रही।

फिर एक टीचर अलग तरीके से मुझ पर दबाव डालने लगी। वह मुझसे मीठी-मीठी बातें करके कहती कि मैं एक अच्छी विद्यार्थी हूँ और वह मुझे बहुत पसंद करती है। इसलिए अगर मुझे स्कूल से निकाल दिया गया तो उसे बहुत दुख होगा। वह मुझे फुसलाने लगी: “तुम्हें अपना पूरा हाथ आगे बढ़ाने की ज़रूरत नहीं। बस ज़रा-सा हाथ उठा दिया करो, उतना ही काफी है। और तुम्हें ‘हेल हिटलर’ का नारा लगाने की भी ज़रूरत नहीं। बस अपने होंठ हिलाकर बोलने का नाटक कर दिया करो।”

जब मैंने ये सारी बातें मम्मी को बतायीं, तो उसने मुझे बाइबल के उन तीन इब्री जवानों की कहानी याद दिलायी जिन्हें बैबिलोन के राजा की मूरत के सामने लाया गया था। मम्मी ने मुझसे पूछा: “उन जवानों को क्या करने के लिए कहा गया था?” मैंने जवाब दिया: “मूरत के आगे झुकने को।” मम्मी ने कहा: “मान लो, अगर उसी वक्‍त ये जवान अपनी जूतियों के फीते बाँधने के लिए झुकते, तो क्या यह सही होता? अब तुम्हें सोचना है कि तुम स्कूल में क्या करोगी। वही करना जो तुम्हें सही लगे।” मैंने फैसला किया कि मैं भी शद्रक, मेशक और अबेदनगो की तरह यहोवा की वफादार बनी रहूँगी।—दानि. 3:1, 13-18.

मेरी टीचरों ने मुझे स्कूल से कई बार निकाला और मुझे धमकी दी कि वे मुझे मेरे मम्मी-पापा से अलग कर देंगे। मैं बहुत घबरा गयी लेकिन मम्मी-पापा हमेशा मेरा हौसला बढ़ाते रहे। हर दिन स्कूल जाने से पहले मम्मी मेरे साथ प्रार्थना करती और यहोवा से कहती कि मेरी बच्ची की हिफाज़त करना। मैं जानती थी कि यहोवा मुझे दृढ़ खड़े रहने की ताकत देगा। (2 कुरिं. 4:7) पापा ने मुझसे कहा कि अगर स्कूल में मुझ पर बहुत ज़्यादा दबाव डाला जाए, तो मैं बिलकुल न डरूँ और सीधे घर चली आऊँ। उन्होंने कहा: “तुम हमारी बेटी हो और हम तुमसे बेहद प्यार करते हैं, यह बात हमेशा याद रखना। मगर तुम्हें खुद दिखाना होगा कि तुम यहोवा की वफादार रहना चाहती हो।” इन शब्दों ने खराई बनाए रखने की मेरी इच्छा को और भी मज़बूत किया।—अय्यू. 27:5.

गेस्टापो मम्मी-पापा से पूछताछ करने और हमारे साहित्य की तलाश में आए दिन घर आते थे। वे पापा और दीदी को उनके काम की जगह से पकड़कर ले जाते और मम्मी को भी घर से ले जाते और कई घंटे बाद ही छोड़ते। स्कूल से लौटते वक्‍त मेरे अंदर हमेशा यही चलता रहता कि पता नहीं आज मम्मी मुझे घर पर मिलेगी या नहीं। कभी-कभी जब मैं घर आती, तो पड़ोसवाली आंटी मुझसे कहती: “वे तुम्हारी माँ को ले गए।” मैं डर के मारे घर में छिप जाती और मेरे मन में तरह-तरह के खयाल उठते: ‘कहीं वे मम्मी को तड़पा तो नहीं रहे होंगे? क्या मैं उसे फिर कभी देख पाऊँगी?’

देश-निकाला

28 जनवरी, 1943 को गेस्टापो सुबह-सुबह साढ़े तीन बजे हमारे घर आ धमके। उन्होंने कहा कि अगर मम्मी-पापा, दीदी और मैं नात्ज़ी पार्टी के सदस्य बन जाएँ तो हमें देश-निकाला नहीं दिया जाएगा। लेकिन जब हमने इनकार किया, तो हमें अपना सामान बाँधने के लिए तीन घंटे की मोहलत दी गयी। मम्मी ने पहले से हमारे बैग में एक-एक जोड़ी कपड़े और एक बाइबल रख दी थी। इसलिए इन तीन घंटों में हमने मिलकर प्रार्थना की और एक-दूसरे की हिम्मत बढ़ायी। पापा ने हमें याद दिलाया कि ‘कोई भी बात हमें परमेश्‍वर के प्यार से अलग नहीं कर सकती।’—रोमि. 8:35-39.

अपने कहे मुताबिक गेस्टापो वापस आए। वह दिन मैं कभी नहीं भूल सकती जब वे हमें ले जा रहे थे और एक बुज़ुर्ग बहन एंग्लाड ने अपनी आँखों में आँसू लिए हमें अलविदा कहा। गेस्टापो हमें मेट्‌ज़ रेल्वे स्टेशन ले गए। ट्रेन में तीन दिन के सफर के बाद हम कोक्वोवीट्‌से शिविर पहुँचे, जो पोलैंड के ऑश्‍वट्‌ज़ि शिविर की निगरानी में आता था। दो महीने बाद हमें ग्लाइवीट्‌से शिविर भेजा गया, जो पहले एक कॉन्वेंट हुआ करता था। नात्ज़ियों ने हमसे कहा कि अगर हममें से हरेक उस कागज़ पर दस्तखत कर दे जिसमें लिखा है कि हमने अपना विश्‍वास छोड़ दिया है, तो वे हमें रिहा कर देंगे और हमारी चीज़ें भी लौटा देंगे। मम्मी-पापा ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। इस पर सैनिकों ने कहा, “तो सारी ज़िंदगी यहीं सड़ते रहो।”

जून के महीने में हमें श्‍वेनटोकवोवीट्‌से भेजा गया जहाँ मुझे सिरदर्द की शिकायत होने लगी और आज भी मैं इस दर्द से परेशान रहती हूँ। ऊपर से मेरी उँगलियों में इंफेक्शन हो गया था। डॉक्टर ने मेरी उँगलियों को सुन्‍न किए बगैर मेरे कई नाखून उखाड़ दिए। खैर, एक अच्छी बात यह थी कि इसके बाद से शिविर के गार्ड छोटे-मोटे काम से मुझे बाहर एक बेकरी में भेजने लगे और वहाँ एक स्त्री मुझे कुछ-न-कुछ खाने को देती थी।

उस वक्‍त तक हमें दूसरे कैदियों से अलग रखा गया था। लेकिन अक्टूबर 1943 में हमें ज़ोम्पकोवीट्‌से के एक शिविर भेजा गया। वहाँ हमें एक अटारी में करीब 60 स्त्री-पुरुषों और बच्चों के साथ रहना पड़ा। एसएस गार्ड (हिटलर का खास सैनिक-दल) के कहने पर हमें ऐसा खाना दिया जाता था, जो सड़ा-गला और खाने लायक नहीं होता था।

इन कठिनाइयों के बावजूद, हमने आशा नहीं छोड़ी। हमने प्रहरीदुर्ग पत्रिका में पढ़ा था कि युद्ध के बाद बड़े पैमाने पर प्रचार होना है। इसलिए हम जानते थे कि हम क्यों इन तकलीफों से गुज़र रहे हैं और बहुत जल्द हमारी कठिनाइयों का अंत होनेवाला है।

जब हमने सुना कि मित्र-राष्ट्र (सोवियत संघ, अमरीका और ब्रिटेन) की सेनाएँ नज़दीक आ रही हैं तो हमें पता चला कि नात्ज़ी सरकार युद्ध हार रही है। सन्‌ 1945 की शुरूआत में एसएस गार्ड ने हमारे शिविर को खाली करने का फैसला किया। उन्‍नीस फरवरी को हमने पैदल चलना शुरू किया और गार्ड ने हमें जबरन 240 किलोमीटर चलवाया। चार हफ्ते बाद हम जर्मनी के श्‍टाइनफेल्स नगर पहुँचे, जहाँ गार्ड ने सारे कैदियों को एक खदान में बंद कर दिया। बहुतों को लगा कि अब हमें मार डाला जाएगा। लेकिन उसी दिन मित्र-राष्ट्र की सेनाएँ वहाँ आ पहुँचीं, एसएस गार्ड भाग खड़े हुए और हमारी आज़माइशों का अंत हो गया।

अपने लक्ष्यों को हासिल करना

करीब ढाई साल शिविरों में रहने के बाद हम 5 मई, 1945 को यूट्‌स नगर में अपने घर वापस लौटे। हमारी हालत बहुत खराब थी, हम गंदे और जूँओं से भरे थे। हमने फरवरी से कपड़े नहीं बदले थे, इसलिए हमने उन कपड़ों को जला दिया। मुझे याद है कि मम्मी ने हमसे कहा: “चलो आज के दिन को हम अपनी ज़िंदगी का सबसे यादगार दिन बनाएँ। हमारे पास कुछ नहीं है। यहाँ तक कि हम जो कपड़े पहने हुए हैं, वे भी हमारे नहीं हैं। फिर भी, हम इस बात के लिए खुश हो सकते हैं कि हम चारों ने अपनी वफादारी बनाए रखी। हमने अपने विश्‍वास से समझौता नहीं किया।”

उसके बाद तीन महीने हम स्विट्‌ज़रलैंड में रहे, जहाँ मेरी सेहत सुधरने लगी। तब मैं फिर से स्कूल जाने लगी और मुझे स्कूल से निकाल दिए जाने का डर नहीं था। अब हम खुलेआम अपने मसीही भाइयों के साथ इकट्ठे हो सकते थे और प्रचार कर सकते थे। मैं कई साल पहले यहोवा को अपना समर्पण कर चुकी थी। लेकिन 28 अगस्त, 1947 को 13 साल की उम्र में मैंने सबके सामने इसे ज़ाहिर किया। पापा ने मुझे मोज़ेल नदी में बपतिस्मा दिया। बपतिस्मे के तुरंत बाद मैं पायनियर बनना चाहती थी, लेकिन पापा ने ज़ोर दिया कि पहले मैं कोई हुनर सीख लूँ। इसलिए मैंने सिलाई का काम सीखा। सन्‌ 1951 में जब मैं 17 साल की थी, तब मैं पायनियर बनी और मुझे पास के ट्योनवील कसबे में सेवा करने के लिए भेजा गया।

उस साल मैं एक सम्मेलन के लिए पैरिस गयी और मैंने मिशनरी सेवा के लिए फॉर्म भरा। मेरी उम्र कम थी, इसलिए भाई नेथन नॉर ने कहा कि वे मेरा फॉर्म “आगे के लिए” रखेंगे। जून 1952 में वॉचटावर बाइबल स्कूल ऑफ गिलियड की 21वीं क्लास के लिए मुझे अमरीका के न्यू यॉर्क राज्य के साउथ लैंसिंग शहर में बुलाया गया।

गिलियड स्कूल और उसके बाद की ज़िंदगी

वाकई, गिलियड स्कूल में मैंने जो अनुभव किया, उसके बारे में जितना भी बयान करूँ कम होगा। मैं स्वभाव से ऐसी थी कि कई लोगों के सामने अगर मुझे बोलने को कहा जाता तो अपनी ही भाषा में बोलना मुझे मुश्‍किल लगता। और जब मुझे पता चला कि गिलियड में अँग्रेज़ी में बोलना पड़ेगा, तो आप समझ सकते हैं कि मेरी क्या हालत हुई होगी। लेकिन स्कूल के शिक्षकों ने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया। एक भाई ने तो मेरा नाम ‘किंगडम स्माइल’ रख दिया, क्योंकि जब किसी बात पर मुझे शर्म आती तो मेरे चेहरे पर झट-से मुस्कुराहट आ जाती।

19 जुलाई, 1953 को न्यू यॉर्क के यैंकी स्टेडियम में हमारा ग्रेजुएशन हुआ और मुझे आइडा कानडूसो के साथ पैरिस में सेवा करने के लिए भेजा गया। पैरिस के रईस लोगों को प्रचार करने में मुझे घबराहट होती थी, लेकिन वहाँ ऐसे कई नम्र लोग भी थे जिनके साथ मैं बाइबल अध्ययन कर पायी। फिर आइडा ने शादी कर ली और 1956 में अफ्रीका चली गयी। लेकिन मैं पैरिस में ही रही।

सन्‌ 1960 में मेरी शादी बेथेल के एक भाई से हुई और हम स्पेशल पायनियर बनकर शॉमोन और विशी नाम के कसबे में सेवा करने लगे। पाँच साल बाद, मुझे टी.बी. हो गया और मुझे पायनियर सेवा छोड़नी पड़ी। इससे मैं बहुत दुखी हो गयी क्योंकि बचपन से मेरा एक ही लक्ष्य था कि मैं ज़िंदगी-भर पूरे समय की सेवा करूँ। कुछ समय बाद मेरे पति ने एक दूसरी औरत के लिए मुझे छोड़ दिया। मैं तो बिलकुल टूट ही गयी थी, लेकिन मेरे आध्यात्मिक भाई-बहनों ने उस मुश्‍किल समय में मुझे सहारा दिया। और यहोवा ने भी मुझे अकेला नहीं छोड़ा। वह तब से लेकर आज तक मेरी सारी परेशानियों और दुखों का बोझ उठाए हुए है।—भज. 68:19.

आज मैं नॉरमैन्डी इलाके के एक कसबे लूविए में रहती हूँ जो फ्रांस के शाखा दफ्तर से ज़्यादा दूर नहीं। हालाँकि मेरी सेहत खराब रहती है, लेकिन मैं खुश हूँ कि यहोवा ने कदम-कदम पर मुझे राह दिखायी है। मेरी परवरिश जिस तरह हुई, उससे आज भी मुझे सही नज़रिया रखने में मदद मिलती है। मम्मी-पापा ने मुझे सिखाया कि यहोवा का वजूद सच्चा है। और वह एक ऐसा शख्स है जिससे मैं प्यार कर सकती हूँ, बात कर सकती हूँ और जो मेरी प्रार्थनाओं का जवाब देता है। सच, ‘यहोवा ने मेरे लिए जितने उपकार किए हैं, उनका बदला मैं उसको क्या दूँ?’—भज. 116:12.

[पेज 6 पर बड़े अक्षरों में लेख की खास बात]

“मैं खुश हूँ कि यहोवा ने कदम-कदम पर मुझे राह दिखायी है”

[पेज 5 पर तसवीर]

6 साल की उम्र में गैस मास्क लिए हुए

[पेज 5 पर तसवीर]

16 साल की उम्र में लक्सम्बर्ग में प्रचार के एक खास अभियान के लिए मिशनरियों और पायनियरों के साथ

[पेज 5 पर तसवीर]

सन्‌ 1953 में एक अधिवेशन में मम्मी-पापा के साथ