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मैं अपने नम्बर कैसे सुधारूँ?

मैं अपने नम्बर कैसे सुधारूँ?

अध्याय १८

मैं अपने नम्बर कैसे सुधारूँ?

जब कई प्राथमिक स्कूल छात्रों से पूछा गया, ‘आप सबसे अधिक चिन्ता किस विषय में करते हैं?’ ५१ प्रतिशत ने कहा, “नम्बर”!

इसमें आश्‍चर्य नहीं कि स्कूल नम्बर युवाओं के बीच चिन्ता का एक प्रमुख स्रोत हैं। नम्बरों का अर्थ हो सकता है पास होंगे या पीछे रह जाएँगे, अच्छे वेतनवाली नौकरी मिलेगी या बस थोड़ी-सी मज़दूरी, माता-पिता से शाबाशी मिलेगी या उनका क्रोध भड़केगा। माना, नम्बरों और परीक्षाओं का अपना स्थान है। यीशु मसीह ने कई बार कुछ बातों के बारे में अपने शिष्यों की समझ को परखा। (लूका ९:१८) और जैसे पुस्तक स्कूलों में माप और आकलन (अंग्रेज़ी) कहती है: “परीक्षा-फल प्रकट कर सकते हैं कि व्यक्‍तिगत छात्र किन क्षेत्रों में तेज़ और कमज़ोर हैं और ये भावी अध्ययन के लिए प्रेरक साधन के रूप में काम कर सकते हैं।” आपके नम्बर आपके माता-पिता को भी कुछ जानकारी देने का काम करते हैं कि आप स्कूल में कैसा कर रहे हैं—चाहे जैसा भी हो।

संतुलन बनाना

लेकिन, नम्बरों के बारे में बहुत अधिक चिन्ता हानिकर तनाव उत्पन्‍न कर सकती है और तीव्र प्रतिस्पर्धा भड़का सकती है। किशोरावस्था पर एक पाठ्य-पुस्तक कहती है कि ख़ासकर कॉलेज जाने के इच्छुक छात्र “प्रतिस्पर्धात्मक जाल में फँस” सकते हैं “जो शिक्षा के बजाय नम्बरों और कक्षा दर्जों पर ज़ोर देता है।” फलस्वरूप, डॉ. विलियम ग्लासर का कहना है, छात्र “स्कूल में जल्दी ही यह पूछना सीख जाते हैं कि परीक्षा में क्या आनेवाला है और . . . केवल उसी विषय का अध्ययन करते हैं।”

राजा सुलैमान ने चिताया: “मैं ने सब परिश्रम के काम और सब सफल कामों को देखा जो लोग अपने पड़ोसी से जलन के कारण करते हैं। यह भी व्यर्थ और मन का कुढ़ना है।” (सभोपदेशक ४:४) चाहे भौतिक धन के लिए हो या शैक्षिक पुरस्कारों के लिए, तीव्र प्रतिस्पर्धा व्यर्थ है। परमेश्‍वर का भय माननेवाले युवा स्कूल में मेहनत करने की ज़रूरत समझते हैं। लेकिन शिक्षा को जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण बात बनाने के बजाय, वे आध्यात्मिक हितों के लिए प्रयास करते हैं, और अपनी भौतिक ज़रूरतों की चिन्ता करने के लिए परमेश्‍वर पर भरोसा रखते हैं।—मत्ती ६:३३; पेशे चुनने के विषय पर अध्याय २२ देखिए।

इसके अलावा, शिक्षा का अर्थ परीक्षाओं में अच्छे नम्बर लाने से अधिक है। इसका अर्थ है जैसा सुलैमान ने कहा “सोचने की क्षमता” विकसित करना, कच्ची जानकारी लेकर उससे ठोस, व्यावहारिक निष्कर्ष निकालने का कौशल। (नीतिवचन १:४, NW) एक युवा जो तुक्के मारने, रटने, या यहाँ तक कि नक़ल करने के द्वारा पास होने लायक़ नम्बर ले आता है, असल में कभी सोचना नहीं सीखता। और गणित में ऊँचे नम्बर लाने का क्या लाभ यदि बाद में आप एक चॆकबुक नहीं मिला पाते?

इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि आप नम्बरों को लक्ष्य नहीं परन्तु स्कूल में अपनी प्रगति आँकने का एक सहायक साधन समझें। लेकिन, आप ऐसे नम्बर कैसे ला सकते हैं जो आपकी क्षमताओं को दर्शाएँ?

सीखने की ज़िम्मेदारी लीजिए!

शिक्षिका लिन्डा नीलसन के अनुसार, बेकार छात्र अकसर “अपने बेकार [स्कूल] काम के लिए अपने बस से बाहर के स्रोतों पर दोष लगाते हैं: अनुचित परीक्षा प्रश्‍न, पक्षपाती शिक्षक, बुरा भाग्य, नियति, मौसम।” लेकिन, बाइबल कहती है: “आलसी का प्राण लालसा तो करता है, और उसको कुछ नहीं मिलता।” (नीतिवचन १३:४) जी हाँ, प्रायः आलस ही कम नम्बरों का असली कारण होता है।

लेकिन, अच्छे छात्र अपने सीखने की ज़िम्मेदारी लेते हैं। टीन पत्रिका ने एक बार ऊँचे नम्बर पानेवाले कुछ हाई (माध्यमिक) स्कूल छात्रों का सर्वेक्षण लिया। उनका रहस्य? “व्यक्‍तिगत प्रेरणा आपको मेहनत करते जाने में मदद देती है,” एक ने कहा। “अपने लिए एक सारणी बनाना और अपने समय को व्यवस्थित करना,” दूसरे ने कहा। “आपको अपने लिए लक्ष्य रखने पड़ते हैं,” एक और ने कहा। जी हाँ, आपके नम्बर कितने अच्छे हैं यह सामान्यतः उन तत्वों पर नहीं निर्भर करता जो आपके बस से बाहर हैं, बल्कि आप पर निर्भर करता है—आप अध्ययन करने और स्कूल में ध्यान लगाने के लिए कितनी मेहनत करने को तैयार हैं—इस पर निर्भर करता है।

‘लेकिन मैं अध्ययन करता हूँ’

कुछ युवा शायद यह दावा करें। वे सचमुच महसूस करते हैं कि वे पहले ही जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं लेकिन कोई फल नहीं मिल रहा। परन्तु कुछ साल पहले, स्टैनफ़र्ड युनिवर्सिटी (यू.एस.ए.) के अनुसंधायकों ने कुछ ७७० छात्रों का सर्वेक्षण लिया और उनसे पूछा कि उनके हिसाब से वे अपने स्कूल-काम में कितनी मेहनत कर रहे हैं। अजीब बात है, कम नम्बर पानेवाले छात्रों ने सोचा कि वे सभी के जितनी मेहनत करते हैं! लेकिन जब उनकी अध्ययन आदतों को जाँचा गया, तब यह पता चला कि असल में वे ऊँचे नम्बर पानेवाले अपने स्कूल-साथियों की तुलना में कहीं कम गृह-कार्य करते हैं।

सबक़? संभवतः आप भी उतनी मेहनत करके नहीं पढ़ रहे हैं जितनी कि आपके विचार से आप कर रहे हैं, और कुछ बदलाव उचित होंगे। शैक्षिक मनोविज्ञान पत्रिका (अंग्रेज़ी) में एक लेख ने दिखाया कि मात्र “गृह-कार्य पर बिताए गए समय को बढ़ाने का हाई स्कूल में एक छात्र के नम्बरों पर सकारात्मक प्रभाव होता है।” असल में, “सप्ताह में १ से ३ घंटे के गृह-कार्य से, औसत निम्न-क्षमता छात्र उस औसत क्षमता छात्र के जितने नम्बर पा सकता है जो गृह-कार्य नहीं करता।”

अपने लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए प्रेरित पौलुस को लाक्षणिक रूप से ‘अपनी देह को मारना कूटना’ पड़ा। (१ कुरिन्थियों ९:२७) उसी प्रकार आपको शायद अपने लिए सख़्ती की नीति अपनानी पड़े, ख़ासकर यदि टीवी या दूसरे विकर्षण आसानी से आपका ध्यान अध्ययन से हटा देते हैं। आप शायद टीवी पर एक चिन्ह लगाकर भी देखना चाहें जिस पर लिखा हो, “जब तक गृह-कार्य न हो जाए कोई टीवी नहीं!”

आपका अध्ययन वातावरण

ख़ासकर अध्ययन के लिए रखा गया एक शान्त स्थान मिले तो हममें से अधिकांश लोग उसका लाभ अवश्‍य उठाएँगे। लेकिन, यदि आपके कमरे की साझेदारी है या आपके घर में जगह कम है, तो काम-चलाऊ व्यवस्था कीजिए! संभवतः रसोई को या किसी के सोने का कमरा हर शाम एकाध घंटे के लिए आपका अध्ययन कक्ष बनाया जा सकता है। या अंतिम उपाय के रूप में, जन पुस्तकालय या किसी मित्र का घर प्रयोग करके देखिए।

यदि संभव हो, तो एक डॆस्क या मेज़ प्रयोग कीजिए जिस पर अपना काम फैलाने के लिए ढेर सारी जगह हो। पॆन्सिल और काग़ज़ जैसी चीज़ें पास ही रखिए ताकि आपको बार-बार उठना न पड़े। और, बुरा न मानिए लेकिन टीवी या रेडियो चालू रखना सामान्यतः ध्यान भंग करता है, वैसे ही जैसे कि टॆलिफ़ोन या लोगों का आना।

यह भी निश्‍चित कीजिए कि आपके पास पर्याप्त, चुभन-रहित रोशनी हो। अच्छी रोशनी अध्ययन-थकान को कम करती है और आपकी आँखों को भी सुरक्षित रखती है। और यदि संभव हो, तो हवादारी और कमरे का तापमान भी देखिए। गर्म कमरे की बनिस्बत एक ठंडा कमरा ज़्यादा सुखद अध्ययन वातावरण प्रदान करता है।

तब क्या यदि आपको अध्ययन करने का मन ही न हो? जीवन शायद ही कभी हमें अपने मन के मालिक होने की छूट देता है। कार्य-स्थल पर, आपको हर दिन काम करना पड़ेगा—चाहे आपका मन करे या नहीं। सो गृह-कार्य को आत्म-अनुशासन का एक अभ्यास समझिए, बाद में कार्य अनुभव के लिए पूर्वाभ्यास। इसके बारे में औपचारिक रहिए। एक अध्यापक सुझाव देता है: “यदि संभव हो, तो अध्ययन हर दिन एक ही स्थान पर और एक ही समय किया जाना चाहिए। इस प्रकार, नियमित अध्ययन एक आदत बन जाएगी, और . . . अध्ययन करने का आपका विरोध कम हो जाएगा।”

आपका अध्ययन नित्यक्रम

फिलिप्पियों ३:१६ (NW) में, पौलुस ने मसीहियों को प्रोत्साहित किया कि “इसी नित्यक्रम में व्यवस्थित रूप से चलते जाएँ।” पौलुस मसीही जीवन के नित्यक्रम की बात कर रहा था। लेकिन एक नित्यक्रम, या कार्य करने का ढंग, तब भी सहायक होता है जब आपके अध्ययन करने के तरीक़े की बात आती है। उदाहरण के लिए, जो आप अध्ययन करने जा रहे हैं उसे व्यवस्थित करने की कोशिश कीजिए। एक क्रम में मिलते-जुलते विषयों (जैसे दो विदेशी भाषाओं) का अध्ययन मत कीजिए। विषयों के बीच छोटा अवकाश लेने की सोचिए, ख़ासकर यदि आपका गृह-कार्य बहुत सारा है।

यदि आपकी कार्य-नियुक्‍ति में बहुत पठन सम्मिलित है, तो आप शायद निम्नलिखित तरीक़ा प्रयोग करके देखना चाहें। पहले, अपने विषय को देखिए। नियुक्‍त विषय पर सरसरी नज़र डालिए, उपशीर्षक, चार्ट, इत्यादि देखिए, ताकि उसकी सामान्य जानकारी हो जाए। फिर, अध्याय मूल-विषयों या विषय वाक्यों पर आधारित प्रश्‍न बनाइए। (यह आपका ध्यान आपके पठन पर केंद्रित रखता है।) अब पढ़िए, इन प्रश्‍नों के उत्तर पाने के लिए। जब आप हर अनुच्छेद या भाग पढ़ चुके होते हैं, तब जो आपने पढ़ा है उसे पुस्तक में देखे बिना सुनाइए, या याददाश्‍त से अपने आपको बताइए। और जब आप पूरी नियुक्‍ति समाप्त कर चुके होते हैं, तब शीर्षक देखने और हर भाग के बारे में अपनी याददाश्‍त जाँचने के द्वारा पुनर्विचार कीजिए। कुछ लोग दावा करते हैं कि इस तरीक़े से छात्रों को अपने पठन का ८० प्रतिशत तक याद रखने में मदद मिली है!

एक अध्यापक आगे कहता है: “छात्र को यह समझाना महत्त्वपूर्ण है कि एक तथ्य अकेला अस्तित्व में नहीं होता परन्तु हमेशा दूसरी जानकारी से सम्बन्धित होता है।” इसलिए, जो आप अध्ययन करते हैं उसे अपनी पहले की जानकारी और अनुभव के साथ मिलाने की कोशिश कीजिए। जो आप सीख रहे हैं उसका व्यावहारिक महत्त्व खोजिए।

दिलचस्पी की बात है, यहाँ परमेश्‍वर का भय माननेवाले युवा को बड़ा लाभ है। क्योंकि बाइबल कहती है: “यहोवा का भय मानना बुद्धि का मूल है।” (नीतिवचन १:७) उदाहरण के लिए, भौतिकी के नियम सीखना एकदम नीरस लग सकता है। लेकिन यह जानना कि सृष्टि के कामों में परमेश्‍वर के ‘अनदेखे गुण देखने में आते हैं,’ जो आप सीखते हैं उसका महत्त्व बढ़ा देता है। (रोमियों १:२०) इसी प्रकार इतिहास प्रायः यहोवा के उद्देश्‍यों की पूर्ति से सम्बन्ध रखता है। सात विश्‍व शक्‍तियों (जिनमें वर्तमान ऐंग्लो-अमेरिकन गठजोड़ सम्मिलित है) की चर्चा स्वयं बाइबल में की गयी है!—प्रकाशितवाक्य १७:१०; दानिय्येल, अध्याय ७.

जो आप सीखते हैं उसे अपनी जानकारी या अपने मसीही विश्‍वास से मिलाने के द्वारा, तथ्यों का आपके लिए कुछ अर्थ होने लगता है, ज्ञान समझ में बदल जाता है। और जैसा सुलैमान ने कहा: “समझवाले को ज्ञान सहज से मिलता है।”—नीतिवचन १४:६.

‘अगले सप्ताह एक परीक्षा होगी’

ये शब्द सुनकर आपको डरने की ज़रूरत नहीं। सबसे पहले, अपने शिक्षक की बातों से यह समझने की कोशिश कीजिए कि वह किस क़िस्म की परीक्षा होगी, जैसे कि निबन्ध परीक्षा या बहु-विकल्पी। साथ ही, परीक्षा से पहले के दिनों में, सुराग़ पाने के लिए ध्यान से सुनिए कि परीक्षा में क्या आएगा। (“यह अगला मुद्दा बहुत महत्त्वपूर्ण है” या “इसे ज़रूर याद रखना” ठेठ संकेत होते हैं, सीनियर स्कॉलॆस्टिक अंग्रेज़ी पत्रिका कहती है।) फिर, अपने नोट्‌स, पाठ्य-पुस्तकों, और गृह-कार्य नियुक्‍तियों पर पुनर्विचार कीजिए।

“जैसे लोहा लोहे को चमका देता है, वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है,” सुलैमान हमें याद दिलाता है। (नीतिवचन २७:१७) संभवतः एक मित्र या एक जनक को आपसे प्रश्‍न पूछकर अभ्यास कराने या जब आप कक्षा-कार्य सुनाते हैं तब सुनने में ख़ुशी होगी। और फिर परीक्षा से पहली रात, आराम कीजिए और अच्छी नींद लेने की कोशिश कीजिए। “तुम में से कौन है, जो चिन्ता करके अपनी अवस्था में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है?” यीशु ने पूछा।—मत्ती ६:२७.

असफलता

परीक्षा में फ़ेल होना—ख़ासकर पास होने की बहुत कोशिश करने के बाद—आपके आत्म-सम्मान को नष्ट कर सकता है। लेकिन अध्यापक मैक्स रैफ़रटी हमें याद दिलाता है: “जब तक हम जीवित हैं, तब तक हमें इस पर आँका जाता है कि हम क्या जानते हैं, हमें कितने अच्छे परिणाम मिलते हैं . . . एक स्कूल जो बच्चों को यह सोचने के लिए भरमाता है कि जीवन में ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ होंगी वह स्कूल नहीं सपनों का कारख़ाना है।” परीक्षा में फ़ेल होने का अपमान लाभकारी हो सकता है यदि वह आपको अपनी ग़लतियों से सीखने और सुधार करने के लिए प्रेरित करता है।

लेकिन ख़राब रिपोर्ट-कार्ड के साथ निराश माता-पिता के सामने जाने के बारे में क्या? इसके डर से कभी-कभी युवा बहुत टाल-मटोल करते हैं। “मैं अपना रिपोर्ट-कार्ड रसोई मेज़ पर रख देता, और ऊपर जाकर दूसरे दिन तक सोने की कोशिश करता,” एक युवा याद करता है। “मैं क्या करता,” दूसरा कहता है, “कि उसे अपनी माँ को दिखाने के लिए आख़िरी घड़ी तक रुकता। मैं उसे सुबह उनके पास ले जाता जब वह काम पर जाने ही वाली होतीं और कहता, ‘यहाँ, आपको इस पर हस्ताक्षर करने हैं।’ उनके पास मुझ से बात करने का समय नहीं होता”—कम-से-कम उस समय तो नहीं। कुछ युवाओं ने तो हेरा-फेरी करके अपने रिपोर्ट-कार्ड पर नम्बर भी बदले हैं!

लेकिन, आपके माता-पिता के पास यह जानने का अधिकार है कि आप स्कूल में कैसा कर रहे हैं। स्वाभाविक है, वे अपेक्षा करते हैं कि आपके नम्बर आपकी क्षमताओं को दर्शाएँ, और यदि आपके नम्बर औसत से कम हैं, तो आप सुयोग्य अनुशासन पाने की अपेक्षा कर सकते हैं। सो अपने माता-पिता से सच बोलिए। ‘अपने पिता की शिक्षा पर कान लगाइए, और अपनी माता की शिक्षा को न तजिए।’ (नीतिवचन १:८) यदि आपको लगता है कि आपसे बहुत ज़्यादा की अपेक्षा की जा रही है, तो इस विषय में उनके साथ बात कीजिए।—अध्याय २ में “मैं अपने माता-पिता को कैसे बताऊँ?” शीर्षक का अंतःपत्र देखिए।

जबकि नम्बर महत्त्वपूर्ण हैं, वे एक व्यक्‍ति के रूप में आपके मूल्य का आख़िरी फ़ैसला नहीं। फिर भी, जिस समय आप स्कूल में हैं उसका लाभ उठाइए, और जितना आपसे हो सके सीखिए। सामान्यतः वह प्रयास आपके नम्बरों में दिखेगा जो कि आपको—और आपके माता-पिता को—ख़ुशी और संतोष देगा।

चर्चा के लिए प्रश्‍न

◻ नम्बर क्या उद्देश्‍य पूरा करते हैं, और उनके बारे में एक संतुलित दृष्टिकोण रखना महत्त्वपूर्ण क्यों है?

◻ यह क्यों महत्त्वपूर्ण है कि आप सीखने के लिए व्यक्‍तिगत ज़िम्मेदारी लें?

◻ स्कूल-उपरांत गतिविधियों में भाग लेने के बारे में कौन-सी कुछ बातों पर विचार किया जाना चाहिए?

◻ कौन-से कुछ तरीक़ों से आप अपने नम्बर सुधार सकते हैं?

◻ आप परीक्षाओं के लिए तैयारी कैसे कर सकते हैं?

◻ आपको असफलता किस दृष्टि से देखनी चाहिए, और क्या ऐसी असफलता को अपने माता-पिता से छिपाया जाना चाहिए?

[पेज 141 पर बड़े अक्षरों में लेख की खास बात]

एक युवा जो तुक्के मारने, रटने, या यहाँ तक कि नक़ल करने के द्वारा पास होने लायक़ नम्बर ले आता है, असल में कभी सोचना नहीं सीखता

[पेज 144,145 पर बक्स/तसवीर]

स्कूल-उपरांत गतिविधियों के बारे में क्या?

अनेक युवा पाते हैं कि स्कूल-उपरांत गतिविधियाँ उन्हें उपलब्धि का भाव देती हैं। “मैं लगभग हर क्लब में था,” बॉल्टीमोर, मॆरीलॆंड (यू.एस.ए.) का एक लड़का याद करता है। “मुझे उन चीज़ों के साथ काम करने से अच्छा लगा जिन्हें मैं पसन्द करता हूँ। मैं एक ऑटोमोटिव क्लब में था क्योंकि मुझे कारों के साथ काम करने में मज़ा आता है। मुझे कम्प्यूटर पसन्द हैं, सो मैं उस क्लब में शामिल हो गया। मुझे ऑडियो पसन्द है, सो मैं उस क्लब में शामिल हो गया।” कॉलेज जाने के इच्छुक छात्रों को ख़ासकर प्रोत्साहित किया जाता है कि स्कूल-उपरांत गतिविधियों में भाग लें।

लेकिन, एक अमरीकी संघ सरकारी अधिकारी ने—जो पहले स्वयं एक शिक्षक था—सजग होइए! से कहा: “संभवतः छात्र स्कूल-काम से अधिक समय पाठ्येतर गतिविधियों में बिताते हैं, जिससे अच्छे नम्बर लाते रहना मुश्‍किल हो जाता है।” जी हाँ, जब पाठ्येतर गतिविधियों की बात आती है तब संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता। कैथी नाम की एक लड़की जो स्कूल की सॉफ़्ट बॉल टीम में खेला करती थी, कहती है: “अभ्यास के बाद, मैं इतनी थक जाती थी कि कुछ और नहीं कर पाती थी। मेरे स्कूल-काम पर प्रभाव पड़ा। सो इस साल मैंने नाम नहीं दिया।”

आध्यात्मिक ख़तरे भी हैं। एक मसीही पुरुष अपने किशोर वर्षों की ओर मुड़कर देखते हुए कहता है: “मैं सोचता था कि मैं तीनों गतिविधियों में मेल बिठा लूँगा: स्कूल-काम, ट्रैक टीम के साथ अभ्यास, और आध्यात्मिक गतिविधियाँ। लेकिन जब कभी तीनों के बीच टकराव होता तब मेरे जीवन का आध्यात्मिक पहलू ही त्यागा जाता।”

युवा थीमॉन, जो स्कूल में दो खेल-कूद टीमों में व्यस्त था, इससे सहमत है: “मैं [आध्यात्मिक उपदेश के लिए राज्य] गृह की सभाओं में उपस्थित नहीं हो पाता था क्योंकि मंगलवार को हम नगर से बाहर होते, गुरुवार को हम नगर से बाहर होते, शनिवार को हम नगर से बाहर होते और रात दो बजे से पहले वापस नहीं आते।” जबकि “देह की साधना से कम लाभ होता है,” यह याद रखना अत्यावश्‍यक है कि “भक्‍ति सब बातों के लिये लाभदायक है।”—१ तीमुथियुस ४:८.

नैतिक ख़तरों के बारे में भी सोचिए। क्या आप हितकर मित्रों के साथ संगति कर रहे होंगे जो एक अच्छा नैतिक प्रभाव डालेंगे? बातचीत का विषय क्या होगा? क्या टीम साथियों या क्लब के सदस्यों का आपके ऊपर बुरा प्रभाव हो सकता है? “बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है,” १ कुरिन्थियों १५:३३ कहता है।

दिलचस्पी की बात है, यहोवा के साक्षियों के बीच अनेक युवाओं ने अपने स्कूल-उपरांत समय को खेल-कूद से कहीं अधिक लाभकारी काम में प्रयोग करने का चुनाव किया है: सृष्टिकर्ता को जानने में दूसरों की मदद करना। कुलुस्सियों ४:५ सलाह देता है: “अवसर को बहुमूल्य समझकर बाहरवालों के साथ बुद्धिमानी से बर्ताव करो।”

[पेज 143 पर तसवीरें]

छात्र अकसर कच्ची अध्ययन आदतों की क़ीमत चुकाते हैं . . . फ़ेल होने के द्वारा

[पेज 146 पर तसवीरें]

स्कूल-उपरांत गतिविधियों को अपने गृह-कार्य के साथ संतुलित करना आसान नहीं है

[पेज 148 पर तसवीर]

माता-पिता एक ख़राब रिपोर्ट-कार्ड देखकर निश्‍चित ही परेशान होंगे। लेकिन यदि आपको लगता है कि वे आपसे बहुत ज़्यादा की अपेक्षा कर रहे हैं, तो इस विषय में उनके साथ बात कीजिए