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अब ज़ोर पकड़ रहा है बिना-खून का इलाज

अब ज़ोर पकड़ रहा है बिना-खून का इलाज

अब ज़ोर पकड़ रहा है बिना-खून का इलाज

“ऑपरेशन करते वक्‍त जितने भी डॉक्टर खून का इस्तेमाल करते हैं उन सब को बिना-खून के ऑपरेशन करने के बारे में भी गंभीरता से सोचना होगा।”—डॉ. योआयेकिम बोल्ट, जर्मनी के लुटविग्ज़हाफेन शहर में एनेस्थीज़िअलजी का प्रोफेसर।

एड्‌स ने डॉक्टरों और विशेषज्ञों को बहुत ज़्यादा एहतियात बरतने पर मजबूर कर दिया है। जैसे कि ऑपरेशन से पहले डॉक्टर इस बात का खास ध्यान रखते हैं कि मरीज़ को चढ़ाए जानेवाले खून की अच्छी तरह जाँच की गई हो। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस एहतियात के बावजूद खून के ज़रिए बीमारियाँ लगने का खतरा पूरी तरह टाला नहीं जा सकता। ट्रांस्फ्यूशन पत्रिका कहती है: “हम जानते हैं कि हम खून को सुरक्षित करने के लिए चाहे कोई भी कदम क्यों न उठाएँ, खून को पूरी तरह खतरे से मुक्‍त करना नामुमकिन है। इसीलिए लोग खून लेने से कतराते हैं।”

इस वज़ह से अब कई डॉक्टर खून चढ़ाने से पहले दो बार सोचते हैं। सैन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया के डॉ. एलैक्स ज़ापोलैन्स्की कहते हैं: “सच पूछो तो खून चढ़ाने का कोई फायदा नहीं। हम तो सभी से आग्रह करते हैं कि वे खून न लें।”

आज आम जनता भी इसके खतरों को पहचानने लगी है। जब 1996 में, कनाडा में एक सर्वे किया गया, तो 89 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे खून लेना पसंद नहीं करेंगे, मगर इसकी जगह कोई और इलाज चलेगा। जर्नल ऑफ वैस्क्यूलर सर्जरी में कहा गया है: “ऐसा नहीं कि हर मरीज़ यहोवा के साक्षियों की तरह खून लेने से इंकार करेगा। लेकिन कोई-न-कोई बीमारी लगने का जो खतरा बना रहता है, इसलिए हमें अपने सभी मरीज़ों के लिए कोई और इलाज ढूँढ़ना होगा।”

लोगों की पसंद

लेकिन शुक्र है, कि आज बिना-खून के इलाज और ऑपरेशन करवाना मुमकिन है। कई मरीज़ों के लिए यह इलाज आखिरी चारा नहीं, बल्कि उनकी पहली पसंद है और इसके पीछे वज़ह भी है। ब्रिटेन के एक बहुत बड़े डॉक्टर, स्टीवन जॆफ्री पोलर्ड का कहना है कि जहाँ तक बिना-खून या खून देकर ऑपरेशन करने की बात है, “बीमारी और मौत की दर दोनों में बराबर ही होती है। मगर खून न लेनेवालों को ऑपरेशन के बाद होनेवाली समस्याओं और इन्फेक्शन का खतरा नहीं रहता।”

आखिर, बिना-खून के इलाज की शुरूआत कैसे हुई? इस सवाल के जवाब में कहा जा सकता है कि खून चढ़ाकर इलाज करने का तरीका तो बीसवीं सदी में ही जाकर मशहूर हुआ है, तो ज़ाहिर है कि इससे पहले बिना-खून के ही इलाज किया जाता था। लेकिन, पिछले बीस-तीस सालों में कुछ डॉक्टरों ने बिना-खून सर्जरी करने के तरीके को काफी मशहूर किया है। पिछले कुछ सालों में इस इलाज को और भी ज़्यादा बढ़ावा मिला। मसलन, 1960 के बाद के सालों में जाने-माने सर्जन डेन्टन कूली ने पहली बार, बिना-खून के दिल के कई मरीज़ों की ओपन-हार्ट सर्जरी की।

इसके अलावा, 1970 के बाद, खून लेने की वज़ह से बढ़ती तादाद में लोग हॆपटाइटिस के शिकार होने लगे थे। इसीलिए बहुत-से डॉक्टरों ने कोई दूसरा इलाज ढूँढ़ना शुरू कर दिया। और 1980 तक डॉक्टरों के कई बड़े दल, बिना-खून के कई ऑपरेशन कर रहे थे। इसके बाद, जब एड्‌स की बीमारी ने चारों तरफ खलबली मचा दी तो दूसरे डॉक्टर भी इस तरकीब को अपनाने में इन्हीं दलों से सलाह-मशविरा करने लगे। इसका नतीजा यही हुआ कि 1990 के बाद से कई अस्पतालों में बिना-खून के इलाज करवाना मुमकिन हो गया, और अगर मरीज़ ऐसा इलाज चाहता है तो उसे पूरी मदद दी जाती है।

इस तरह का इलाज इतना कामयाब साबित हुआ कि अब डॉक्टरों ने हर ऑपरेशन बिना-खून के करना शुरू कर दिया है। पहले जिस ऑपरेशन या एमरजन्सी मामलों में खून चढ़ाना ज़रूरी समझा जाता था, उनमें भी अब खून नहीं दिया जाता। कनेडियन जर्नल ऑफ ऐनसथेज़िया में डी. एच. डब्ल्यू. वॉन्ग कहते हैं: “कार्डियक (हृदय रोग) और वैस्क्यूलर ऑपरेशन, स्त्री रोग या जनन की समस्याओं से संबंधित ऑपरेशन, ऑर्थोपेडिक (हड्डी के रोग) या यूरोलोजिकल जैसे बड़े ऑपरेशन बिना-खून चढ़ाए बहुत ही अच्छे तरीके से किए जा सकते हैं।”

बिना-खून के सर्जरी से एक फायदा यह है कि इससे मरीज़ का इलाज बेहतर तरीके से होता है। क्लीवलैंड, ओहायो में डॉ. बेन्जमिन जे. रेइकस्टेन का कहना है कि “एक काबिल सर्जन का यही मकसद होता है कि ऑपरेशन के वक्‍त कम-से-कम खून बहे।” दक्षिण अफ्रीका की एक पत्रिका कहती है कि बिना-खून के सर्जरी में कई बार “कम वक्‍त लगता है, साथ ही इसे ज़्यादा स्वच्छता के साथ, कम दाम में किया जा सकता है। और-तो-और ऑपरेशन के बाद मरीज़ की देखभाल करने में ज़्यादा पैसा और वक्‍त नहीं लगता।” ये तो बस एकाध वज़ह हैं कि क्यों आज दुनिया-भर में 180 अस्पतालों में ऐसे प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं, जिनमें लोगों का इलाज बिना-खून के किया जा रहा है।

खून चढ़ाने के बारे में यहोवा के साक्षियों का नज़रिया

यहोवा के साक्षी बाइबल में दिए गए नियम की वज़ह से खून नहीं लेते हैं। * मगर इसका यह मतलब नहीं है कि वे इलाज ही नहीं करवाना चाहते। इसके बजाय वे पूरी-पूरी कोशिश करते हैं कि बिना-खून का इस्तेमाल किए, अच्छे-से-अच्छा इलाज करवाएँ। न्यू यॉर्क अस्पताल के भूतपूर्व डाइरेक्टर, डॉ. रिचर्ड के. स्पेन्स का कहना है: “यहोवा के साक्षी अपने और अपने अज़ीज़ों के लिए सबसे बेहतरीन इलाज चाहते हैं। सिर्फ वे ही ऐसे लोग हैं जिन्हें इलाज के तरीकों के बारे में बाकी लोगों से ज़्यादा जानकारी होती है और यही बात सबसे अच्छा इलाज चुनने में उनकी मदद करती है।”

ऐसे कई यहोवा के साक्षियों की बिना-खून के सर्जरी करके डॉक्टरों ने इस तरह का इलाज करने में बड़ी निपुणता हासिल की है। सर्जन डेन्टन कूली की ही बात ले लीजिए। उसकी टीम ने 27 सालों में, 663 यहोवा के साक्षियों की बिना-खून के ओपन-हार्ट सर्जरी की है। इससे यह साबित हुआ कि बिना-खून के हार्ट ऑपरेशन में कामयाबी हासिल करना मुमकिन है।

मगर यह भी सच है कि बहुतों ने यहोवा के साक्षियों को खून न लेने की वज़ह से बुरा-भला कहा है। दूसरी तरफ, एसोसिएशन ऑफ एनस्थेटिस्ट ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एण्ड आयरलॆंड ने एक लेख प्रकाशित किया जिसमें लिखा था कि यहोवा के साक्षियों का यह विश्‍वास दिखाता है कि वे सचमुच “ज़िंदगी की कदर करते हैं।” सच बात तो यह है कि आज लोगों को जिस किस्म का सुरक्षित इलाज मिल रहा है उसे मुमकिन करने में यहोवा के साक्षियों का बहुत बड़ा हाथ है क्योंकि उन्होंने खून लेने से हमेशा इंकार किया है। नॉर्वे के नैशनल अस्पताल के प्रोफेसर स्टैन ए. इवनसन का कहना है कि “नॉर्वे के लोगों के स्वास्थ्य की अच्छी देख-भाल करवाने में यहोवा के साक्षियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उन्हें जब भी सर्जरी की ज़रूरत पड़ती, तो वे हमेशा अपने डॉक्टरों से बातचीत करते कि उन्हें किस तरह का इलाज करवाना है और खून न लेने के उनके अटल विश्‍वास की वज़ह से ही हमने आज इतनी तरक्की की है।”

बिना-खून के इलाज के बारे में ज़्यादा जानकारी देकर डॉक्टरों की मदद करने के लिए, यहोवा के साक्षियों ने हॉस्पिटल लिएज़ाँन कमिटी स्थापित की है। पूरी दुनिया में अब ऐसी 1,400 कमिटियाँ मौजूद हैं जिन्होंने कंप्यूटर में 3,000 से भी ज़्यादा लेख तैयार कर रखे हैं ताकि कभी-भी डाक्टरों को या इस क्षेत्र से ताल्लुक रखनेवाले दूसरे लोगों को इस बारे में जानकारी दी जा सके। इन कमिटियों के बारे में बॉस्टन कॉलॆज लॉ स्कूल के प्रोफेसर डॉ. चार्ल्स बैरन का कहना है: “हॉस्पिटल लिएज़ाँन कमिटियों की बदौलत आज न सिर्फ यहोवा के साक्षी बल्कि दूसरे मरीज़ भी बिना-खून के इलाज करवा सकते हैं।” *

यहोवा के साक्षियों ने रक्‍तहीन सर्जरी और इलाज के बारे में जितनी भी जानकारी इकट्ठी की है उससे चिकित्सा क्षेत्र में काम करनेवाले कई लोगों को फायदा हुआ है। उदाहरण के लिए, कुछ लेखकों ने मिलकर एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था ऑटोट्रांस्फ्यूशन: थेराप्यूटिक प्रिंसिपल्स एण्ड ट्रॆंड्‌स। इस किताब को लिखते वक्‍त उन्होंने यहोवा के साक्षियों से जानना चाहा कि बिना-खून चढ़ाए इलाज करने के और कौन-कौन से उपाय हैं। साक्षियों ने खुशी-खुशी उनकी मदद की। बाद में इन लेखकों ने उनका एहसान मानते हुए कहा: “इस विषय को लेकर हमने जितनी भी छान-बीन की है, उसमें हमने देखा कि जितने साफ और बेहतरीन ढंग से यहोवा के साक्षियों ने खून न चढ़ाने के बारे में हमें पूरी-पूरी जानकारी दी, उस तरह की जानकारी किसी और ने नहीं दी।”

चिकित्सा क्षेत्र में इतनी तरक्की हुई है कि अब बहुत लोग बिना-खून के इलाज के बारे में गंभीरता से सोचने लगे हैं। तो भविष्य के लिए हम क्या उम्मीद रख सकते हैं? एड्‌स वाइरस का पता लगानेवाले प्रोफेसर लूक मॉन्टान्ये का कहना है: “जिस तरह हमारी आँखों से परदा उठ रहा है और हमें नयी-नयी जानकारी हासिल हो रही हैं, उस हिसाब से बहुत जल्द ऐसा वक्‍त आएगा जब खून चढ़ाने का तरीका गुमनामी के अंधेरों में खो जाएगा।” मगर तब तक यह दूसरा उपाय यानी बगैर खून के सर्जरी और इलाज सैकड़ों की ज़िंदगियों में रोशनी का चिराग जला चुका होगा।

[फुटनोट]

^ अस्पताल से इज़ाज़त पाकर, हॉस्पिटल लिएजाँन कमिटियाँ अस्पताल के मॆडिकल स्टाफ को इस बारे में और ज़्यादा जानकारी दे सकती हैं। इसके अलावा अगर कोई मरीज़ अपने इलाज में अपने डॉक्टर से खुलकर बातचीत करने के लिए उनकी मदद चाहता है तो वे खुशी-खुशी उसे मदद देने के लिए तैयार रहती हैं।

[पेज 7 पर बक्स/तसवीरें]

कुछ डॉक्टरों का कहना है

‘अब सिर्फ यहोवा के साक्षियों के लिए ही नहीं, बल्कि हर मरीज़ के लिए बिना-खून के ऑपरेशन करवाना संभव है। मेरे हिसाब से हर डॉक्टर को बिना-खून के इलाज करना चाहिए।’—डॉ. योआयेकिम बोल्ट, जर्मनी के लुटविग्ज़हाफेन शहर में एनेस्थीज़िअलजी का प्रोफेसर।

“खून चढ़ाने के तरीकों में पहले से बहुत सुधार आया है, मगर फिर भी खून चढ़ाने में काफी खतरे हैं, जैसे कि हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम का कमज़ोर होना, हॆपटाइटिस और एड्‌स जैसे बीमारियाँ लगना।”—डॉ. टेरेन्स जे. साकी, चिकित्सा के असिस्टेंट प्रोफेसर।

“ज़्यादातर डॉक्टर बिना सोचे-समझे मरीज़ को खून चढ़ा देते हैं। मैं ऐसा नहीं करता।”—डॉ. एलैक्स ज़ापोलैन्स्की, सैन फ्रांसिस्को हार्ट इन्स्टीट्यूट में दिल के मरीज़ों का इलाज करनेवाले विभाग के डाइरेक्टर।

“मुझे नहीं लगता कि पेट का आम ऑपरेशन करवाने के लिए एक सामान्य मरीज़ को खून चढ़ाना ज़रूरी है।”—डॉ. योहानॆस शेला, जर्मनी के येना शहर में सर्जरी का प्रोफेसर।

[तसवीरें]

डॉ. योआयेकिम बोल्ट

डॉ. टेरेन्स जे. साकी

[पेज 8, 9 पर बक्स/तसवीरें]

रक्‍तहीन सर्जरी और इलाज के

कुछ तरीके

फ्लूइड्‌स (द्रव्य): रिंगर्स लैक्टेट सोल्यूशन, डेक्सट्रन, हाइड्रॉक्सीएथिल स्टार्च आदि कुछ ऐसे फ्लूइड्‌स हैं जो शरीर में खून के आयतन को कम नहीं होने देते। इसलिए खून की कमी से होनेवाले शॉक से बचा जा सकता है। आज जिन फ्लूइड्‌स के प्रयोग की जाँच की जा रही है वे शरीर के हिस्सों में ऑक्सिजन भी पहुँचाते हैं।

ड्रग्स (दवाइयाँ): प्रयोगशाला में तैयार किए गए प्रोटीन के ज़रिए शरीर में रेड ब्लड सेल्स (एरिथ्रोपोइटिन), ब्लड प्लेटलेट्‌स (इन्टरल्यूकिन-11), और अलग-अलग किस्म के वाइट ब्लड सेल्स (जीएम-सीएसएफ, जी-सीएसएफ) बढ़ाने में मदद मिलती है। कुछ ऐसे ड्रग्स (अप्रोटिनिन, एंटीफिब्रिनोलिटिक्स) और हार्मोन (डेस्मोप्रैसिन) भी हैं जो ऑपरेशन के वक्‍त खून के बहाव को कम कर सकते हैं।

बाइलोजिकल हेमोस्टैट: खून बहनेवाले हिस्सों पर कॉलेजन और सेलूलोज़ से बने गॉज या पैड लगाकर खून का बहना बंद किया जाता है। इसके अलावा फाइब्रिन ग्लूज़ और सीलेंट को, फटे घावों में ठूँस दिया जाता है जिससे खून का रिसाव रुक जाता है। इसके अलावा जहाँ-जहाँ से खून बह रहा है उन माँसपेशियों को इनसे ढककर खून का रिसाव रोका जा सकता है।

खून को बचाकर रखना: अब ऐसी मशीनें इस्तेमाल की जाने लगी हैं जो सर्जरी के दौरान बहनेवाले खून को जमा कर लेती हैं और खून को अच्छी तरह साफ करती जाती हैं। फिर उसे मरीज़ के शरीर में दोबारा सुरक्षित तरीके से पहुँचा देती हैं। कई गंभीर मामलों में इस मशीन की बदौलत कुछ मरीज़ों का कई लीटर खून बचाया जा सकता है।

ऑपरेशन में काम आनेवाले औज़ार: कुछ औज़ार खून की नसों की चीर-फाड़ करने के साथ-साथ, फौरन उन्हें सील भी कर देते हैं। कुछ ऐसे भी औज़ार हैं जो खून को बहने से रोकते हैं। लैपैरास्कोप जैसे औज़ारों का भी इस्तेमाल किया जाता है जो बड़े ऑपरेशनों में ज़्यादा खून बहने नहीं देते।

ऑपरेशन करने के तरीके: अगर किसी भी ऑपरेशन को कामयाब बनाना है तो यह बेहद ज़रूरी है कि ऑपरेशन से पहले कई अनुभवी डॉक्टरों से सलाह-मशविरा किया जाए ताकि ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों को कोई परेशानी न हो। ऑपरेशन के वक्‍त अगर ज़्यादा खून बहने लगे तो यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि सबसे पहले खून के बहाव को रोका जाए। अगर 24 घंटों के अंदर खून का बहाव बंद न हुआ तो मरीज़ की जान को खतरा हो सकता है। इसके लिए एक बार में ही बड़ा ऑपरेशन करने के बजाय इस प्रक्रिया को छोटे-छोटे ऑपरेशनों में पूरा करके ज़्यादा खून बहने की समस्या को कम किया जा सकता है।

[पेज 10 पर बक्स/तसवीरें]

बिना-खून के इलाज—क्या यह “इलाज की” नयी “पद्धति” है?

सजग होइए! ने बिना-खून के इलाज और ऑपरेशन करवाने के फायदों पर इस क्षेत्र के चार विशेषज्ञों के साथ बातचीत की।

अपने धार्मिक विश्‍वासों की वज़ह से खून न लेनेवाले मरीज़ों के अलावा, किस तरह के मरीज़ बिना-खून के इलाज करवाना पसंद करते हैं?

डॉ. श्‍पान: हमारे सॆंटर में बिना-खून के इलाज करवानेवाले अकसर ऐसे मरीज़ होते हैं जिन्हें बहुत अच्छी तरह पता होता है कि वे क्या कर रहे हैं। उन्हें इस इलाज के बारे में पूरी जानकारी होती है।

डॉ. शैन्डर: सन्‌ 1998 में, निजी वज़हों से खून लेने से इंकार करनेवाले मरीज़ों की गिनती उन मरीज़ों से ज़्यादा थी जिन्होंने अपने धार्मिक विश्‍वास की वज़ह से खून लेने से इंकार किया।

डॉ. बॉइड: अब कैंसर के मरीज़ों को ही देखिए। यह बात कई बार साबित हो चुकी है कि अगर उन्हें खून न चढ़ाया जाए तो उनकी हालत में बहुत जल्दी सुधार होता है। और खून लेनेवालों के मुकाबले, ज़्यादातर मामलों में उन्हें दोबारा इस बीमारी का सामना नहीं करना पड़ता।

डॉ. श्‍पान: हमारे यहाँ अकसर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और उनके परिवारवाले, बिना-खून के इलाज करवाने आते हैं। यहाँ तक कि डॉक्टरों की भी यही माँग है कि हम बगैर खून के उनका इलाज करें! जब एक सर्जन की पत्नी को ऑपरेशन के लिए लाया गया था तो उसने हमसे साफ-साफ कह दिया: “बस एक बात का ख्याल रखना कि उसे किसी भी हाल में खून न चढ़ाया जाए!”

डॉ. शैन्डर: मेरे एनेस्थीज़िया विभाग के लोगों का कहना है कि ‘जिन मरीज़ों का बगैर खून के इलाज किया जाता है, उनकी हालत में बहुत जल्दी सुधार होता है। अगर यह तरीका सबसे अच्छा है तो हम इलाज की दो पद्धतियाँ क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या हम हर मरीज़ का इलाज इसी तरीके से नहीं कर सकते?’ इसलिए अब हम चाहते हैं कि रक्‍तहीन सर्जरी और इलाज ही नयी पद्धति बन जाएँ।

श्री. अर्नशॉ: यह सच है कि हम खासकर यहोवा के साक्षियों का बिना-खून के ऑपरेशन करते हैं मगर यह हमारी ख्वाहिश है कि हर मरीज़ का ऐसे ही इलाज किया जाए।

क्या इलाज के इस नये तरीके में खर्चा ज़्यादा होता है?

श्री. अर्नशॉ: नहीं, इसमें खर्चा कम होता है।

डॉ. शैन्डर: बिना-खून के इलाज में 25 प्रतिशत पैसा बचाया जा सकता है।

डॉ. बॉइड: कुछ नहीं तो कम-से-कम ज़्यादा खर्च से बचने के लिए ही, यह इलाज चुना जा सकता है।

यह नया तरीका किस हद तक कामयाब रहा है?

डॉ. बॉइड: मुझे लगता है कि हम काफी हद तक कामयाब हुए हैं। और ये तो बस शुरूआत ही है। अब तो हमें खून इस्तेमाल ना करने के और भी ज़बरदस्त कारण मिल रहे हैं।

[तसवीरें]

डॉ. डोनॉट आर. श्‍पान ज़ूरिक, स्विट्‌ज़रलैंड में एनेस्थीज़िअलजी का प्रोफेसर

डॉ. आरीए शैन्डर अमरीका में एनेस्थीज़िअलजी का असिस्टेंट क्लिनिकल प्रोफेसर

श्री. पीटर अर्नशॉ, एफआरसीएस, लंडन, इंग्लैंड में कंसल्टंट ऑर्थोपेडिक सर्जन

डॉ. मार्क इ. बॉइड कनाडा में ऑबस्टेट्रिक्स और गाइनोकॉलजी का प्रोफेसर

[पेज 11 पर बक्स]

मरीज़ को क्या करना चाहिए

▪ यह नौबत कभी मत आने दीजिए कि जब डॉक्टर आपको खून चढ़ाने के लिए कहे तभी आप उससे बगैर खून के इलाज करने की बात कहें। इस बारे में अपने डाक्टर से पहले ही साफ-साफ बात कर लीजिए। बुज़ुर्गों और गर्भवती महिलाओं के मामले में इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए। साथ ही माता-पिता को अपने छोटे बच्चों के इलाज के मामले में भी यह बात ध्यान में रखनी चाहिए।

▪ बेहतर यही होगा कि आप कागज़ पर या किसी कानूनी दस्तावेज़ पर यह लिख कर रखें कि आप किस तरह का इलाज चाहते हैं।

▪ अगर आपका डॉक्टर खून चढ़ाने के लिए आप पर दबाव डाल रहा है तो किसी दूसरे डॉक्टर के पास जाइए जो बगैर खून के इलाज करने के लिए तैयार है।

▪ कुछ रक्‍तहीन दवाइयों का असर होने में वक्‍त लगता है। इसलिए अगर आपको पता चले कि आपको ऑपरेशन करवाने की ज़रूरत है तो तुरंत दवाइयाँ लेना शुरू कर दीजिए।