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विश्‍व-दर्शन

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तनाव-ग्रस्त छात्र

भारत में, स्कूल के हर साल के अंत में परीक्षाओं के आते ही कई बच्चों का तनाव बढ़ जाता है। ये रिपोर्ट मुम्बई शहर के एशियन एज अखबार ने पेश की। परीक्षाओं से कुछ ही वक्‍त पहले तैयारियाँ करने में रात-दिन एक करने और अच्छे नंबरों से पास होने का दबाव कुछ बच्चे बर्दाश्‍त नहीं कर पाते और इसी वजह से परीक्षा के दौरान मनोवैज्ञानिकों के पास मदद के लिए जानेवाले छात्रों की गिनती दुगुनी हो जाती है। कुछ माँ-बाप की यही इच्छा रहती है कि उनका बच्चा परीक्षा में अच्छे नंबर लाए और इसीलिए वे बच्चों का खेल-कूद और मनोरंजन सब बंद करवा देते हैं। जैसा कि मनोविज्ञानी वी. के. मुन्द्रा कहते हैं: “बच्चों पर माता-पिता का ज़बरदस्त दबाव पड़ता है। साथ ही बच्चे दूसरों से आगे निकलने की होड़ में लगे रहते हैं।” वह आगे कहते हैं कि कई माता-पिता को “यह एहसास नहीं होता कि अगर वे अपने बच्चों को थोड़ा आराम करने दें तो उनका तनाव कम होगा और वे तरो-ताज़ा होकर अच्छी तरह से पढ़ाई कर सकेंगे।” डॉ. हरीश शेट्टी का कहना है कि आज तो परीक्षा का तनाव “पहली क्लास से सातवीं क्लास के बच्चों को भी होने लगा है।”

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जंगली सूअर आ पहुँचे शहरों में

जर्मनी में साप्ताहिक अखबार डी वोक का कहना है कि जंगल में रहनेवाले जो सूअर जंगल से बाहर आने में कतराते थे, वे अब शहरों में आ पहुँचे हैं। क्योंकि एक तो यहाँ उन्हें बहुत खाना मिलता है दूसरे शिकारियों का कोई डर नहीं है। यहाँ तक कि बर्लिन शहर में कई जंगली सुअरनियों ने बच्चे दिए हैं। ये भूखे जंगली सूअर न सिर्फ जंगल जैसे इलाकों और पब्लिक पार्कों में घूमते हैं बल्कि लोगों के घरों के बगीचों को भी उजाड़ कर फूलों के कंद खा जाते हैं। इन सुअरों का वज़न 350 किलोग्राम तक हो सकता है और इन्होंने शहर के कई नागरिकों को डरा दिया है। कुछ मामलों में तो लोग इनसे बचने के लिए पेड़ पर चढ़ गए या टेलिफोन बूथ में जा छिपे। इन सुअरों की वजह से कई गाड़ियों के एक्सिडेंट भी हुए हैं। नौकरी से घर लौटने पर कई लोगों की भिड़ंत इन भद्दे जानवरों से हुई है। एक व्यक्‍ति ने कहा: “मैं भला अपने घर में कैसे घुस सकता हूँ जबकि मेरे घर के दरवाज़े और मेरी गाड़ी के बीच रास्ता रोके 20 जंगली सूअर खड़े हों?”

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नयी जातियों को अपना नाम देना

“क्या आप अपने किसी अज़ीज़ को कोई अनोखा तोहफा देना चाहते हैं, जिससे उसका दिल खुश हो जाए?” यह सवाल साइंस मैगज़ीन ने किया था। यही मैगज़ीन आगे कहती है, “चिंता की कोई बात नहीं क्योंकि इसका उपाय मौजूद है। अगर आप नए-नए जीव-जन्तुओं की खोजबीन के लिए दान दें, तो बदले में आप किसी ऑर्किड, या मच्छर या क्लोमी की नयी जाति का नाम अपने अज़ीज़ के नाम पर रख सकते हैं। और यह नाम विज्ञान के साहित्य में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज़ हो जाएगा।” आप चाहें तो अपना नाम भी दे सकते हैं। हाल ही में की गयी खोज से पता चला है कि जीव-जन्तुओं की मौजूदा जातियों में से सिर्फ करीब दस प्रतिशत जातियों को नाम दिया गया है और विज्ञान की किताबों में उनके बारे में लिखा गया है। ऐसी ही हज़ारों जातियाँ म्यूज़ियम की दराज़ों में बिना किसी नाम के पड़ी हुई हैं। अब लोग अपने कंप्यूटर में एक वॆब साइट खोल सकते हैं, जहाँ वे ऐसे ही बेनाम जन्तुओं की तसवीरें और उनके बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं, बस नाम मिलने की देर है और साइंस की किताबों में यह भी आ जाएँगी। तो फिर 2,800 डॉलर या उससे ज़्यादा का दान देने से आप अपनी पसंद के किसी भी जीव को अपने अज़ीज़ के नाम के साथ लातीनी भाषा के कुछ शब्द जोड़कर नया नाम दे सकते हैं। इस इंतज़ाम से, “बायोपैट” नाम का संगठन यही उम्मीद करता है कि जो दान उन्हें मिलेगा उन पैसों से वह नए जीव-जन्तुओं और पौधों की पहचान करने और नयी-नयी जातियों का बचाव भी कर पाएँगे।

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नाबालिगों की शादी

हाल ही में किए गए राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे से पता चला है कि भारत में कम-से-कम 36 प्रतिशत विवाहित लोगों की उम्र 13 और 16 साल के बीच है। मुम्बई का एशियन एज अखबार कहता है कि इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि 17 और 19 साल की उम्र के बीच की 64 प्रतिशत लड़कियाँ या तो गर्भवती हैं या बच्चा पैदा कर चुकी हैं। रिपोर्ट कहती है कि 20 से 24 साल की उम्र की माताओं के मुकाबले 15 से 19 साल की उम्र की माताओं की गर्भावस्था की वजह से मौत होने का खतरा दुगुना रहता है। इसके अलावा, पिछले कुछ सालों में अनैतिक संबंधों से फैलनेवाली बीमारियाँ 15 से 24 साल की उम्र के युवाओं में बढ़कर दुगुनी हो गयी है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन बढ़ती हुई समस्याओं की वजह, लैंगिक मामलों के बारे में शिक्षा की कमी और मीडिया और दोस्तों के ज़रिए हासिल की गयी गलत जानकारी है।

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एक बीमारी से पीछा छुड़ाने के चक्कर में दूसरी बीमारी गले पड़ गई

दी इकॉनॉमिस्ट मैगज़ीन कहती है: “तीस साल पहले ईजिप्ट में, पाँच में से तीन लोग बिलहार्ज़िया नाम की बीमारी से पीड़ित थे। यह रोग वॉटर-स्नेल में मौजूद परजीवियों द्वारा फैलाया जा रहा था।” बिलहार्ज़िया के खिलाफ कई अभियान चलाए गए और इस रोग से लड़ने के लिए नयी-नयी दवाइयों का इस्तेमाल किया गया जिससे इसका खतरा काफी हद तक टल गया है। लेकिन ऐसा लगता है कि इस रोग को रोकने के लिए जो अभियान शुरू में चलाए गए थे उनसे “लाखों लोगों को हॆपटाइटिस-सी की बीमारी लग गयी है। हॆपटाइटिस-सी ऐसा रोग है जो एक खतरनाक वाइरस से फैलता है। और आगे जाकर ये शायद बिलहार्ज़िया की जगह ले लेगा और ईजिप्ट का सबसे खतरनाक रोग बन जाएगा।” इसकी वजह यह है कि बिलहार्ज़िया के लिए जिन इंजेक्शनों का इस्तेमाल किया गया था उनको “ठीक से स्टेरिलाइज़ न करके उनका बार-बार इस्तेमाल किया गया था। . . . वैज्ञानिकों ने 1988 में कहीं जाकर खून से फैलनेवाले इस वाइरस (HCV) का पता लगाया है।” सर्वे द्वारा पता चला है कि ईजिप्ट में “हॆपटाइटिस-सी की वजह से मरनेवालों की दर दुनिया में सबसे ज़्यादा है।” ईजिप्ट के करीब 1 करोड़ 10 लाख लोगों या छः में से एक व्यक्‍ति को यह रोग है। आगे चलकर इनमें से 70 प्रतिशत लोगों को लिवर की गंभीर बीमारी हो सकती है और 5 प्रतिशत लोगों के लिए यह बीमारी घातक साबित हो सकती है। बिलहार्ज़िया के खिलाफ चलाए गए अभियान के बारे में यह लेख कहता है कि “डॉक्टरों द्वारा फैलाया गया यह वाइरस अब तक का सबसे बड़ा हादसा था।” साथ में यह मैगज़ीन कहती है कि “सिर्फ एक बात से तसल्ली मिलती है कि अगर ये अभियान नहीं चलाए जाते तो शायद बिलहार्ज़िया से न जाने और भी कितने लोग मारे जाते।”

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बच्चे, ज़ुल्म का शिकार

युनाइटॆड नेशन्स्‌ चिल्ड्रन्स फंड अपनी रिपोर्ट, सन्‌ 2000 में दुनिया में बच्चों की हालत में बताता है कि “हर दिन . . . पाँच साल से कम उम्रवाले, 30,500 बच्चे ऐसे कारणों से मरते हैं, जिन्हें रोका जा सकता है।” इंडियन ऎक्सप्रॆस अखबार के मुताबिक “यह अनुमान लगाया गया है कि पिछले दस सालों में हो रहे लड़ाई-झगड़ों की वजह से 20 लाख बच्चों की मौत हुई है और 60 लाख बच्चे घायल या अपाहिज हो गए हैं। और ऐसे लाखों-करोड़ों बच्चे हैं जिनका हक छीनकर उन पर ज़ुल्म ढाया जा रहा है।” इसके अलावा, 1.5 करोड़ से भी ज़्यादा बच्चे शरणार्थी हैं और दस लाख से भी ज़्यादा बच्चे अपने माँ-बाप से बिछड़ गए हैं या अनाथ हो गए हैं। इतना ही नहीं, इस रिपोर्ट में अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर संगठन (ILO) द्वारा किए गए अध्ययनों का भी ज़िक्र किया गया है, जिससे पता चला है कि 5 से 14 साल की उम्र के कम-से-कम 25 करोड़ बच्चों से ज़बरदस्ती मज़दूरी करवायी जा रही है। और इनमें से 20 प्रतिशत बच्चे खतरनाक परिस्थितियों में मज़दूरी कर रहे हैं। पूरी दुनिया में करीब 10 लाख बच्चों से ज़बरदस्ती अपना शरीर बेचने का काम करवाया जा रहा है और इस वजह से हर महीने 2,50,000 बच्चे HIV वाइरस से पीड़ित हो रहे हैं। और 13 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल नहीं जाते और इनमें से दो-तिहाई लड़कियाँ हैं।

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चीन में लज़ीज़ खाने के लिए जंगली जानवरों का शिकार

डाउन टू अर्थ मैगज़ीन कहती है कि चीन देश में लोगों का “रहन-सहन और खाना-पीना बदल रहा है” जिस वजह से वहाँ के जंगली जानवरों की ज़िंदगी को खतरा है। क्यों? क्योंकि वहाँ यह धारणा ज़ोर पकड़ रही है कि कुछ जंगली जानवरों को खाना सेहत के लिए अच्छा होता है। इस वजह से इन असाधारण चीज़ों को ज़ायकेदार तरीके से परोसने की माँग बढ़ गयी है। लोग अपने खाने में सबसे ज़्यादा साँप खाना पसंद करते हैं और ज़हरीले साँपों की कीमत दूसरे साँपों से दुगुनी होती है। ऐसे और भी कई जानवर हैं जिन्हें लोग बेहद पसंद करते हैं और जिन्हें आप चीन के किसी भी रेस्तराँ के मेन्यू कार्ड में पाएँगे। ये जानवर हैं जंगली सूअर, जंगली बिल्ली (सिवेट कैट), भेक, मेंढक, पाइथन, पेंगोलिन, तिब्बती बारहसिंगा, और कुछ दुर्लभ परिंदे। इनमें से बहुत-से जानवरों की जातियों का नामो-निशान मिटने पर है, इसलिए इन्हें बचाने के लिए सरकार की तरफ से कोशिश की जा रही है। फिर भी रेस्तराँ के कुछ मालिक ऐसे बोर्ड लगाते हैं जहाँ ग्राहकों को यकीन दिलाया जाता है कि वे खाने में वाकई जंगली जानवर देते हैं और ये जानवर न तो पालतू हैं, न ही इन्हें कृत्रिम रूप से पाला गया है। अपनी मरज़ी से व्यंजन तैयार करनेवाले लोगों से जंगल के जानवरों को बचाने के लिए, चीनी सरकार ने अभियान चलाया है और इसके लिए वह यह नारा इस्तेमाल कर रही है “जंगली जानवर खाना बंद करो।”

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सिगरेट पीएँ या ना पीएँ प्रदूषण से कोई नहीं बच सकता

मुम्बई में टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फन्डमेन्टल रिसर्च का कहना है कि भारत में सिगरेट पीनेवाले ज़्यादातर बच्चों को बहुत ही कम उम्र में सिगरेट पीने की लत लग जाती है। सड़कों पर रहनेवाले बच्चे, जिन पर निगरानी रखने के लिए माँ-बाप नहीं हैं, वे करीब 8 साल की उम्र में ही सिगरेट पीना शुरू कर देते हैं, जबकि स्कूल जानेवाले बच्चे जिनके माँ-बाप हैं, 11 साल की उम्र में सिगरेट पीना शुरू कर देते हैं। लेकिन मुम्बई में एक और सर्वे से पता चला है कि जिन बच्चों की अच्छी परवरिश हुई है और जो सिगरेट नहीं पीते, वे इस कदर प्रदूषित हवा में साँस ले रहे हैं कि यह दिन में दो पैकेट सिगरेट पीने के बराबर है! दि एशियन एज अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के पाँच सबसे ज़्यादा दूषित शहरों में मुंबई और दिल्ली का भी नाम आता है। मुम्बई की सड़कों पर हर दिन 9,00,000 गाड़ियाँ चलती हैं इसके अलावा 3,00,000 गाड़ियाँ हर दिन इस शहर में आती-जाती रहती हैं। इस हिसाब से मुम्बई शहर में प्रदूषण की दर, विश्‍व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा लगायी गयी प्रदूषण सीमा से 600 से 800 प्रतिशत ज़्यादा है।

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पक्षियों के लिए खतरनाक

कैनडा के टोरोन्टो शहर का अखबार द ग्लोब एण्ड मेल कहता है: “उत्तर अमरीका में ऑफिस बिल्डिंगें और संचार मीनारें, बड़ी ही खामोशी से न जाने कितने पक्षियों की जान ले चुकी हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि इस महाद्वीप में हर साल, 10 करोड़ पक्षी इन इमारतों और घरों की खिड़कियों से टकराकर मर जाते हैं।” रात को ऑफिस की बत्तियों से आनेवाली रोशनी से, एक जगह से दूसरी जगह यात्रा करनेवाले पक्षी ऐसी उलझन में पड़ जाते हैं कि उन्हें समझ नहीं आता कि उन्हें कौन-सी दिशा में जाना है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या बहुत बड़ी है। पक्षी-विज्ञानी डेविड विलर्ड कहते हैं: “मैं इस महाद्वीप में, और इस देश में एक-भी ऐसी जगह नहीं जानता जहाँ पर यह समस्या न हो।” कई दल, जैसे कि टोरोन्टोस फेटल लाइट अवेयरनैस प्रोग्राम, ऑफिस के कर्मचारियों को रात के वक्‍त बत्तियाँ बंद करने की शिक्षा दे रहे हैं।

इसके अलावा, जर्मनी का अखबार फ्रैंकफर्टर ऐलजीमाइन साइटूंग यह रिपोर्ट देता है कि “आकाश में रोशनी फैलानेवाली” बड़ी-बड़ी बत्तियों से भी रात में उड़नेवाले पक्षी अपना रास्ता भूल जाते हैं। ये बत्तियाँ दरअसल लोगों को डिस्को और दूसरी मनोरंजन की जगहों पर आने के लिए आकर्षित करती हैं। इन बत्तियों की वजह से चमगादड़ और दूसरे पक्षियों को सही दिशा का अता-पता नहीं चलता है। उलझन में पक्षी अपने झुंड से अलग हो जाते हैं, दिशा बदल देते हैं, चिंता के मारे मदद के लिए पुकारते हैं और अपनी यात्रा को बीच में ही रोक देते हैं। कभी-कभी पक्षी उलझन की वजह से आकाश में एक ही जगह पर घंटों गोल-गोल घूमते रहते हैं और आखिर में थककर चूर हो जाते हैं और ज़मीन पर उतर आते हैं। और कुछ कमज़ोर पक्षी तो वहीं दम तोड़ देते हैं। फ्रैंकफर्ट में पक्षियों की रक्षा करनेवाले एक इन्स्टीट्यूट ने “आकाश में रोशनी फैलानेवाली” बत्तियों पर पाबंदी लगाने की माँग की है।

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