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आनन्दित परमेश्‍वर के साथ खुशी पाइए

आनन्दित परमेश्‍वर के साथ खुशी पाइए

आनन्दित परमेश्‍वर के साथ खुशी पाइए

“निदान, हे भाइयो, आनन्दित रहो; . . . और प्रेम और शान्ति का दाता परमेश्‍वर तुम्हारे साथ होगा।”2 कुरिन्थियों 13:11.

1, 2. (क) बहुत-से लोग खुश क्यों नहीं हैं? (ख) खुशी क्या है और हम कैसे आनंदित रह सकते हैं?

 आज संकटों से भरे इन दिनों में, ज़्यादातर लोगों को खुश होने की कोई वजह नज़र नहीं आती। जब उन पर या उनके किसी अज़ीज़ पर मुसीबत आन पड़ती है तो वे शायद प्राचीनकाल के अय्यूब जैसा महसूस करते हैं, जिसने कहा था: “मनुष्य जो स्त्री से उत्पन्‍न होता है, वह थोड़े दिनों का और दुख से भरा रहता है।” (अय्यूब 14:1) मसीहियों को भी इस “कठिन समय” की वजह से आनेवाले तनाव और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। और इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं कि यहोवा के वफादार सेवक कभी-कभी निराश होकर हिम्मत हार बैठते हैं।—2 तीमुथियुस 3:1.

2 मगर, मसीही परीक्षाओं के दौरान भी खुश रह सकते हैं। (प्रेरितों 5:40, 41) यह कैसे मुमकिन है, इसे समझने के लिए आइए देखें कि खुशी क्या है। खुशी एक ऐसी भावना है जो तब पैदा होती है जब हमारे साथ कुछ अच्छा होता है या भविष्य में कुछ अच्छा होने की उम्मीद नज़र आती है। * इसलिए, अगर हम वक्‍त निकालकर यह सोचें कि आज हमें कौन-सी आशीषें मिल रही हैं और परमेश्‍वर के नए संसार में हमें कौन-सी खुशियाँ मिलेंगी तो हम आनंदित रह पाएँगे।

3. किस अर्थ में कहा जा सकता है कि सभी के पास खुश रहने की कोई-न-कोई वजह ज़रूर है?

3 हर इंसान को कुछ ऐसी आशीषें ज़रूर मिली हैं जिनके लिए वह एहसानमंद हो सकता है। एक परिवार का मुखिया शायद अपनी नौकरी खो बैठे। बेशक उसे चिंता तो होगी, क्योंकि उसे अपने परिवार की ज़रूरतें जो पूरी करनी हैं। लेकिन, वह इस आशीष के लिए खुश हो सकता है कि वह तंदरुस्त है और उसके शरीर में ताकत है। क्योंकि दोबारा काम मिलने पर, वह मेहनत करने के लायक तो होगा। दूसरी तरफ, एक मसीही बहन को अचानक एक ऐसी बीमारी लग जाती है जो उसे धीरे-धीरे कमज़ोर करती जा रही है। मगर वह इस बात से खुशी पा सकती है उसके ऐसे प्यारे दोस्त और ऐसा परिवार है जिनके सहारे की बदौलत ही वह इस बीमारी का सामना हिम्मत और गैरत से कर पाती है। और सभी सच्चे मसीही, चाहे उनके हालात कैसे भी क्यों न हों, इस बात से खुशी पा सकते हैं कि उन्हें “आनन्दित परमेश्‍वर” यहोवा को और “आनन्दित और एक ही अधिपति” यीशु मसीह को जानने का सम्मान मिला है। (1 तीमुथियुस 1:11; 6:15, NW) जी हाँ, यहोवा परमेश्‍वर और यीशु मसीह सारे विश्‍व में सबसे ज़्यादा खुश हैं। उन्होंने अपनी खुशी कायम रखी है, हालाँकि इस धरती पर जो हो रहा है और जो यहोवा परमेश्‍वर ने इसके लिए चाहा था उसमें ज़मीन-आसमान का फर्क है। अपनी खुशी कायम रखने के बारे में हम उनकी मिसाल से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

उनकी खुशी कभी कम नहीं हुई

4, 5. (क) पहले इंसानों की बगावत देखकर यहोवा ने क्या किया? (ख) यहोवा ने इंसानों के मामले में कैसे एक अच्छा रवैया बनाए रखा?

4 अदन के बाग में, जब पहले जोड़े आदम और हव्वा को बनाया गया तो उनकी अच्छी सेहत, उनकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रही थी और दिमागी तौर पर वे सिद्ध थे। उन्हें बहुत ही बढ़िया काम सौंपा गया था और इस काम के लिए उन्हें बिलकुल सही माहौल भी दिया गया था। सबसे बढ़कर उन्हें यहोवा परमेश्‍वर के साथ लगातार बातचीत करने का गौरव मिला हुआ था। परमेश्‍वर का उद्देश्‍य था कि उनके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ हों। मगर इन तमाम वरदानों को पाने के बाद भी हमारे पहले माता-पिता को इससे संतुष्टि नहीं मिली; इसलिए उन्होंने ‘भले या बुरे के ज्ञान के वृक्ष’ का फल चुराकर खा लिया जिसके लिए मना किया गया था। परमेश्‍वर की आज्ञा को तोड़ने का यह एक काम, उन तमाम दुःखों का सबब बन गया जो आज उनके वंशजों के रूप में हम भुगत रहे हैं।—उत्पत्ति 2:15-17; 3:6; रोमियों 5:12.

5 मगर यहोवा ने आदम और हव्वा की एहसानफरामोशी की वजह से अपनी खुशी नहीं खोयी। उसे विश्‍वास था कि उनके बच्चों में से कम-से-कम कुछ लोगों के दिल में तो उसकी सेवा करने की तमन्‍ना जागेगी। उसे इस बात का इतना यकीन था कि उसने आदम और हव्वा के बच्चों में से आज्ञाकारी लोगों को पाप और मौत के चंगुल से छुड़ाने के अपने मकसद का ऐलान कर दिया। यहोवा ने जब यह ऐलान किया, उस वक्‍त आदम और हव्वा की पहली संतान पैदा भी नहीं हुई थी! (उत्पत्ति 1:31; 3:15) सदियाँ बीतती गयीं और ज़्यादातर लोग आदम और हव्वा के नक्शे-कदम पर ही चले, मगर इतने लोगों के आज्ञाकारी न होने पर भी यहोवा ने मानव परिवार से मुँह नहीं मोड़ा। इसके बजाय, उसकी नज़र ऐसे लोगों पर लगी रही जिन्होंने ‘उसके मन को आनन्दित’ किया, उससे प्यार करने की वजह से उसे खुश करने की पूरी-पूरी कोशिश की।—नीतिवचन 27:11; इब्रानियों 6:10.

6, 7. किन बातों ने यीशु को खुश रहने में मदद दी?

6 यीशु के बारे में क्या, उसने अपनी खुशी कैसे कायम रखी? जब यीशु स्वर्ग में एक ताकतवर आत्मिक प्राणी था तो पृथ्वी पर जी रहे इंसानों के काम देखने का उसे पूरा-पूरा मौका मिला होगा। उनकी असिद्धताएँ उसे साफ नज़र आयी होंगी, मगर यीशु फिर भी उनसे प्रेम करता था। (नीतिवचन 8:31) बाद में, जब वह पृथ्वी पर आया और खुद इंसानों के “बीच में डेरा किया,” तब भी मानवजाति के बारे में उसका नज़रिया बदला नहीं। (यूहन्‍ना 1:14) परमेश्‍वर का सिद्ध बेटा, पापी इंसानों के बारे में इतना अच्छा नज़रिया कैसे रख सका?

7 पहली बात तो यह है कि यीशु ने न तो अपने-आप से और ना ही दूसरों से हद-से-ज़्यादा उम्मीदें बाँधीं। वह जानता था कि वह पूरी दुनिया को बदलने नहीं आया है। (मत्ती 10:32-39) इसलिए, जब सच्चे दिल का एक भी इंसान राज्य का संदेश स्वीकार करता था तो यीशु को इसी बात से बहुत खुशी मिलती थी। हालाँकि उसके चेलों का व्यवहार और रवैया कई बार बहुत बुरा होता था, फिर भी उसे पता था कि वे दिल में तो परमेश्‍वर की इच्छा पूरी करने का इरादा रखते हैं और इसी वजह से वह उनसे प्यार करता था। (लूका 9:46; 22:24, 28-32, 60-62) गौर करने लायक बात यह है कि अपने स्वर्गीय पिता से प्रार्थना करते वक्‍त, यीशु ने अपने चेलों की उस अच्छाई पर ध्यान दिया जो उस वक्‍त तक उनमें मौजूद थी। उसने कहा: “उन्हों ने तेरे वचन को मान लिया है।”—यूहन्‍ना 17:6.

8. कुछ ऐसे तरीके बताइए जिनसे हम अपनी खुशी कायम रखने में यहोवा और यीशु जैसे बन सकते हैं।

8 बेशक, इस मामले में यहोवा परमेश्‍वर और यीशु मसीह की मिसाल पर अच्छी तरह ध्यान देने से हम सभी को फायदा होगा। क्या हम और ज़्यादा यहोवा के जैसे बन सकते हैं, ताकि जब सारे काम हमारी उम्मीदों के मुताबिक नहीं होते तब हम हद-से-ज़्यादा चिंता न करने लगें? क्या हम यीशु के नक्शे-कदम पर ज़्यादा ध्यान से चल सकते हैं, ताकि हम अपने मौजूदा हालात के बारे में अच्छा नज़रिया बनाए रखें, साथ ही अपने से और दूसरों से हद-से-ज़्यादा उम्मीदें न रखें? आइए देखें कि ये उसूल कैसे एक ऐसे काम पर कारगर ढंग से लागू किए जा सकते हैं जो सभी जोशीले मसीहियों को बेहद अज़ीज़ है। यह है प्रचार का काम।

प्रचार के बारे में अच्छा नज़रिया बनाए रखिए

9. यिर्मयाह की खुशी कैसे वापस लौट आयी और उसकी मिसाल से हमें कैसे मदद मिल सकती है?

9 यहोवा चाहता है कि हम उसकी सेवा में खुश रहें। मगर हमारी खुशी इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि प्रचार के काम में हमें कैसे नतीजे मिलते हैं। (लूका 10:17, 20) भविष्यवक्‍ता यिर्मयाह ने सालों-साल ऐसे इलाके में प्रचार किया जहाँ उसकी बातों पर किसी ने ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। जब यिर्मयाह ने लोगों के इस बुरे व्यवहार पर ध्यान लगाया तो वह मायूस हो गया। (यिर्मयाह 20:8) लेकिन जब उसने इस बात पर मनन किया कि उसका संदेश कितना बढ़िया है, तो उसकी खुशी वापस लौट आयी। यिर्मयाह ने यहोवा से कहा: “जब तेरे वचन मेरे पास पहुंचे, तब मैं ने उन्हें मानो खा लिया, और तेरे वचन मेरे मन के हर्ष और आनन्द का कारण हुए; क्योंकि, हे . . . यहोवा, मैं तेरा कहलाता हूं।” (यिर्मयाह 15:16) जी हाँ, यिर्मयाह खुश था कि उसे परमेश्‍वर का वचन प्रचार करने का अवसर मिला है। हम भी इसी वजह से खुश हो सकते हैं।

10. चाहे हमारे क्षेत्र में कोई सुसमाचार को न भी सुने, फिर भी हम प्रचार के काम में अपनी खुशी कैसे बनाए रख सकते हैं?

10 अगर ज़्यादातर लोग सुसमाचार को मानने से इंकार कर भी दें, तो भी प्रचार करते वक्‍त हमारे पास खुश रहने की बहुत बड़ी वजह है। याद कीजिए कि यहोवा को पूरा भरोसा था कि कुछ इंसानों के अंदर उसकी सेवा करने की तमन्‍ना जागेगी। यहोवा की तरह, हमें कभी यह उम्मीद नहीं खोनी चाहिए कि कम-से-कम कुछ लोग ऐसे होंगे जो परमेश्‍वर की हुकूमत के खिलाफ उठाए गए मसले को समझेंगे और राज्य के संदेश को स्वीकार करेंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोगों के हालात बदलते रहते हैं। एक ऐसा इंसान भी जो अपनी ज़िंदगी से खुश है, अचानक कुछ खोने के बाद या कोई हादसा झेलने के बाद जीवन के अर्थ के बारे में शायद गंभीरता से सोचने लगे। जब ऐसा व्यक्‍ति ‘अपनी आध्यात्मिक ज़रूरत के प्रति सचेत होता’ है, तब क्या आप उसकी मदद करने के लिए वहाँ मौजूद होंगे? (मत्ती 5:3, NW) हो सकता है कि अगली बार जब आप अपने क्षेत्र में जाएँगे तो कोई व्यक्‍ति सुसमाचार सुनने के लिए तैयार बैठा हो!

11, 12. एक नगर में क्या हुआ और इससे हम क्या सीख सकते हैं?

11 हमारे क्षेत्र में रहनेवाले लोग भी बदल सकते हैं। एक मिसाल पर गौर कीजिए। एक छोटे-से नगर में कुछ नौजवान जोड़े अपने बच्चों के साथ रहते थे। ये सभी परिवार एक-दूसरे के काफी करीब थे। जब यहोवा के साक्षी उनके पास गए तो उन्हें हर दरवाज़े पर एक ही जवाब मिला, “हमें नहीं सुनना!” और अगर किसी ने राज्य संदेश में दिलचस्पी दिखायी भी, तो उसके पड़ोसी फौरन साक्षियों के खिलाफ उनके कान भर देते। कहने की ज़रूरत नहीं कि उस इलाके में प्रचार करना बहुत मुश्‍किल था। मगर, साक्षियों ने हिम्मत नहीं हारी, वे उनके पास जाकर प्रचार करते रहे। इसका क्या नतीजा निकला?

12 कुछ अरसा बीतने पर, उस नगर के बहुत-से बच्चे बड़े हुए, उन्होंने शादियाँ कीं और वहीं अपने घर बसाए। इन नौजवानों को इस बात का एहसास हुआ कि उनके जीने के तरीके से उन्हें सच्ची खुशी हासिल नहीं हुई है, इसलिए उनमें से कुछ नौजवान सच्चाई की खोज करने लगे। उन्हें सच्चाई तब मिली जब उन्होंने साक्षियों द्वारा सुनाए जा रहे सुसमाचार को स्वीकार किया। तो फिर काफी सालों के बाद, उस इलाके की छोटी-सी कलीसिया बढ़ने लगी। राज्य का प्रचार करनेवाले उन भाइयों की खुशी का अंदाज़ा लगाइए जिन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी! हमारी दुआ है कि राज्य के गौरवशाली संदेश को लगातार सुनाते रहने से हमें भी ऐसी ही खुशी मिलती रहे!

सच्चाई में भाई-बहन आपको सहारा देंगे

13. जब हमारी हिम्मत टूट जाती है, तब हम किसका सहारा ले सकते हैं?

13 जब दबाव बढ़ते जाते हैं या किसी हादसे से आप पूरी तरह टूट जाते हैं, तब आप किसका सहारा ले सकते हैं? यहोवा के लाखों समर्पित सेवक पहले यहोवा से प्रार्थना करते हैं और फिर अपने मसीही भाई-बहनों का सहारा लेते हैं। जब यीशु पृथ्वी पर था, तो वह भी अपने चेलों से मिलनेवाली मदद की कदर करता था। अपनी मौत से पहले आखिरी रात को, उसने उनके बारे में कहा कि “तुम वह हो, जो मेरी परीक्षाओं में लगातार मेरे साथ रहे।” (लूका 22:28) बेशक, वे चेले असिद्ध थे मगर उनकी वफादारी से परमेश्‍वर के बेटे को बहुत हिम्मत मिली। हम भी सच्चाई में अपने भाई-बहनों से बहुत हिम्मत हासिल कर सकते हैं।

14, 15. अपने बेटे की मौत के सदमे को बरदाश्‍त करने में एक जोड़े को कहाँ से मदद मिली और आपने उनके अनुभव से क्या सीखा?

14 एक मसीही जोड़े, मीशेल और डाइआन ने भाई-बहनों के सहारे की अहमियत को जाना। उनके बेटे ज़ोनाताँ की उम्र 20 साल थी और वह भी साक्षी था। वह बड़ा ही खुश-मिज़ाज और ज़िंदादिल लड़का था और उसके माँ-बाप जानते थे कि उसका भविष्य बहुत सुनहरा होगा। लेकिन डॉक्टरी जाँच से पता लगा कि ज़ोनाताँ को ब्रेन ट्यूमर है। डॉक्टरों ने बड़ी हिम्मत से ज़ोनाताँ को बचाने की पूरी-पूरी कोशिश की मगर दिन-ब-दिन उसकी हालत बिगड़ती चली गयी। और आखिरकार एक ऐसी दोपहर आयी जो ढलते-ढलते उसे मौत की नींद सुला गयी। मीशेल और डाइआन की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गयी। उन्हें पता था कि उस शाम जो सेवा सभा हो रही थी वह लगभग खत्म होने पर थी। फिर भी, वे अपने भाइयों से दिलासा पाने के लिए तरस रहे थे और इसलिए उन्होंने वहाँ मौजूद प्राचीन से उन्हें राज्य-गृह ले जाने को कहा। जब वे वहाँ पहुँचे तो उसी वक्‍त कलीसिया में ज़ोनाताँ की मौत की खबर सुनायी जा रही थी। सभा के बाद, दुःख के सागर में डूबे माँ-बाप को उनके मसीही भाई-बहनों ने घेर लिया, उन्हें गले लगाया और दिलासा दिया। डाइआन याद करते हुए कहती है: “जब हम हॉल के अंदर जा रहे थे तो हमें लग रहा था कि हमारा सबकुछ लुट चुका है, मगर हमारे भाइयों से हमें कितनी हिम्मत मिली, उन्होंने डूबते को सहारा दे दिया! वे हमारे दुःख को तो नहीं मिटा सकते थे, मगर उन्होंने इस सदमे को बरदाश्‍त करने में हमारी मदद की!”—रोमियों 1:11, 12; 1 कुरिन्थियों 12:21-26.

15 इस दुःख की वजह से मीशेल और डाइआन अपने भाइयों के और भी करीब आ गए। इसी वजह से वे एक-दूसरे के और भी करीब आ पाए। मीशेल कहता है: “मैंने अपनी प्यारी पत्नी की और ज़्यादा कदर करना सीखा। जब हम निराश हो जाते हैं, तब हम एक-दूसरे को बाइबल की सच्चाई के बारे में बताते हैं और याद दिलाते हैं कि कैसे यहोवा हमें सँभाले हुए है।” डाइआन आगे कहती है: “अब राज्य की आशा हमारे लिए और ज़्यादा मायने रखती है।”

16. हमारे भाइयों को अपनी ज़रूरतों के बारे में बताना क्यों ज़रूरी है?

16 जी हाँ, ज़िंदगी में आनेवाली मुसीबत की घड़ियों में हमें अपने मसीही भाई-बहनों से ‘सान्त्वना मिल’ सकती है और इस तरह हमें अपनी खुशी कायम रखने में मदद मिलेगी। (कुलुस्सियों 4:11, नयी हिन्दी बाइबिल) बेशक, वे हमारे दिल की बात तो नहीं जान सकते। इसलिए, जब हमें सहारे की ज़रूरत हो तब अच्छा होगा कि हम उन्हें इसके बारे में बताएँ। और फिर भाइयों से मिलनेवाली सांत्वना के लिए हम दिल से एहसानमंदी दिखा सकते हैं, मानो हमारे लिए यह सांत्वना यहोवा की तरफ से ही आ रही है।—नीतिवचन 12:25; 17:17.

अपनी कलीसिया को गौर से देखिए

17. एक अकेली माँ कौन-कौन-सी चुनौतियों का सामना करती है और ऐसे लोगों के बारे में हमारा नज़रिया कैसा है?

17 आप अपने मसीही भाई-बहनों को जितना करीब से जानेंगे, उतनी ही आपके मन में उनके लिए कदरदानी बढ़ेगी और आपको उनकी संगति से खुशी मिलेगी। अपनी कलीसिया को गौर से देखिए। आपको क्या नज़र आता है? कलीसिया में क्या एक ऐसी बहन मौजूद है जो अकेले ही जी-जान से, सच्चाई के मार्ग पर अपने बच्चों की परवरिश कर रही है? क्या आपने इस बहन की उम्दा मिसाल के बारे में ध्यान से सोचा है? वह किन-किन समस्याओं से जूझ रही है इसकी कल्पना करने की कोशिश कीजिए। एक अकेली माँ जिसका नाम जनीन है, बताती है कि उसे किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ये हैं: अकेलापन, साथ काम करनेवाले पुरुषों की गंदी नीयत, पैसों की तंगी। मगर, वह कहती है कि सबसे बड़ी चुनौती अपने बच्चों की भावनात्मक ज़रूरतों को पूरा करना है, क्योंकि हर बच्चे की ज़रूरतें एक-सी नहीं होतीं। जनीन एक और समस्या के बारे में कहती है: “पति की कमी को पूरा करने के लिए अपने बेटे को घर के मुखिया का दर्जा देने की इच्छा पर काबू पाना बहुत मुश्‍किल हो सकता है। मेरी एक बेटी है, और मुझे अपने आपको बार-बार यह याद दिलाना पड़ता है कि वह बच्ची है, मेरी उम्र की सहेली नहीं जिसे मैं अपनी निजी समस्याएँ बताकर उस पर हद-से-ज़्यादा बोझ डाल दूँ।” परमेश्‍वर के लिए श्रद्धा रखनेवाले हज़ारों अकेले माता/पिता की तरह, जनीन भी पूरे दिन नौकरी करने के साथ-साथ अपने परिवार की देखभाल करती है। वह अपने बच्चों के साथ बाइबल का अध्ययन भी करती है, उन्हें प्रचार करना भी सिखाती है और उन्हें कलीसिया की सभाओं में ले जाती है। (इफिसियों 6:4) यहोवा यह देखकर कितना खुश होता होगा कि हर दिन यह परिवार सच्चाई की राह पर चलने के लिए कितनी मेहनत कर रहा है! ऐसे लोगों के हमारे बीच में होने से क्या हमें दिली खुशी नहीं होती? सचमुच, हमें सच्ची खुशी मिलती है।

18, 19. मिसालें देकर समझाइए कि हम कलीसिया के सदस्यों के लिए कदरदानी कैसे बढ़ा सकते हैं।

18 अपनी कलीसिया को एक बार फिर देखिए। आपको शायद ऐसी विधवाएँ या विधुर नज़र आएँ जो वफादारी से सेवा कर रहे हैं और सभाओं में आना कभी ‘नहीं छोड़ते।’ (लूका 2:37) क्या वे कभी-कभी अकेलापन महसूस करते हैं? बेशक करते होंगे। वे अपने साथियों की कमी बहुत बुरी तरह महसूस करते हैं! मगर वे यहोवा की सेवा में व्यस्त रहते हैं और दूसरों में निजी दिलचस्पी लेते हैं। उनकी स्थिरता और उनका अच्छा रवैया कलीसिया की खुशी को और भी बढ़ाता है! एक मसीही बहन जिसे पूरे समय की सेवा करते हुए 30 से ज़्यादा साल हो गए, वह कहती है: “मुझे उन बुज़ुर्ग भाई-बहनों को देखकर बहुत खुशी होती है जिन्होंने बहुत-सी परीक्षाओं का सामना किया है और आज भी वफादारी से यहोवा की सेवा कर रहे हैं!” जी हाँ, हमारे बीच मौजूद बुज़ुर्गवार मसीही अपने कम-उम्र भाई-बहनों का बहुत हौसला बढ़ाते हैं।

19 उन नए लोगों के बारे में क्या जिन्होंने हाल ही में कलीसिया की सभाओं में आना शुरू किया है? जब वे सभाओं में जवाब देकर अपना विश्‍वास ज़ाहिर करते हैं तो क्या इससे हमारी हिम्मत नहीं बढ़ती? सोचिए कि उन्होंने बाइबल का अध्ययन शुरू करने के वक्‍त से अब तक कितनी तरक्की की है। यहोवा उनसे बहुत खुश है। क्या हम भी खुश हैं? क्या हम अपनी खुशी ज़ाहिर कर रहे हैं और जो मेहनत वे करते हैं उसकी तारीफ करते हैं?

20. यह क्यों कहा जा सकता है कि कलीसिया में हर व्यक्‍ति की अपनी-अपनी अहमियत होती है?

20 क्या आप शादी-शुदा हैं, अविवाहित हैं या अकेले माता/पिता हैं? क्या आप एक ऐसे लड़के/लड़की हैं जिसके पिता (या माँ) नहीं हैं? या क्या आप एक विधवा या विधुर हैं? क्या आप कई सालों से कलीसिया की सभाओं में हाज़िर होते आए हैं या क्या आपने हाल ही में सभाओं में आना शुरू किया है? यकीन रखिए कि आपकी वफादारी की मिसाल से हम सभी का हौसला बढ़ता है। और जब आप सबके साथ मिलकर राज्य का कोई गीत गाते हैं, जवाब देते हैं या ईश्‍वरशासित सेवकाई स्कूल में दिया गया भाग पेश करते हैं तो आपकी मेहनत से हमारी खुशी बढ़ती है। इससे भी ज़्यादा, आपकी इस मेहनत से यहोवा का दिल खुश होता है।

21. क्या करने के हमारे पास बहुत-से कारण हैं, मगर कौन-से सवाल पैदा होते हैं?

21 जी हाँ, मुसीबतों से भरे इन दिनों में भी हम अपने आनंदित परमेश्‍वर की सेवा खुशी से कर सकते हैं। पौलुस की इस सलाह को मानने के हमारे पास बहुत-से कारण हैं: “आनन्दित रहो; . . . और प्रेम और शान्ति का दाता परमेश्‍वर तुम्हारे साथ होगा।” (2 कुरिन्थियों 13:11) लेकिन, तब क्या अगर हम पर प्राकृतिक विपत्ति आती है, या हमें सताया जाता है या हमें पैसों की भारी तंगी हो जाती है? ऐसे हालात में भी क्या अपनी खुशी कायम रखना मुमकिन है? अगले लेख को ध्यान से पढ़कर आप खुद इन सवालों के जवाब का पता लगाइए।

[फुटनोट]

^ यहोवा के साक्षियों द्वारा प्रकाशित, इंसाइट ऑन द स्क्रिप्चर्स का खंड 2, पेज 119 देखिए।

क्या आप जवाब दे सकते हैं?

• खुशी के बारे में क्या बताया गया है?

• अच्छा रवैया बनाए रखने से हमें खुश रहने में कैसे मदद मिलती है?

• अपनी कलीसिया के इलाके के बारे में सही नज़रिया रखने में कौन-सी बात हमारी मदद करेगी?

• किन तरीकों से आप अपनी कलीसिया के भाई-बहनों की कदर करते हैं?

[अध्ययन के लिए सवाल]

[पेज 10 पर तसवीरें]

हमारे इलाके के लोग बदल सकते हैं

[पेज 12 पर तसवीर]

आपकी कलीसिया के भाई-बहन किन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं?